अपने पिता जी के साथ एएम तुराज
- फोटो : अमर उजाला
देश-विदेश के मुशायरों में भागीदारी रहती है, मगर मुंबई की व्यस्तता आड़े आती रहती है। बकौल तुराज, मैं दिवानी मस्तानी हो गई, घूमर, कहीं जो बादल बरसे, तेरे लिए मेरे करीम आदि उनके लिखे गाने खूब पसंद किए गए है। वर्ष 2006 में उन्होंने कुड़ियों का है जमाना, फिल्म के लिए पहली बार गीत लिखे। फिल्म गुजारिश के गीतों को लेकर भंसाली से हुई मुलाकात ने नई राहें खोल दी। बचपन से कविता और शायरी लिखने का शौक रहा। उर्दू, अरबी और हिंदी की समझ ने गीतों को लिखने की कला में पारंगत कर दिया। गीतों की रचना करना एक अलग कला है। तुराज बताते हैं कि वेस्ट यूपी की बोलचाल, रहन-सहन और संस्कृति की पृष्ठभूमि पर एक कहानी लिखने में व्यस्त हैं। मेरठ और बिजनौर में प्रवास कर तथ्य लिए हैं।
नुमाइश के मुशायरे में नहीं बुलाए गए तुराज
जिला कृषि एवं औद्योगिक प्रदर्शनी के मुशायरे में आमंत्रित नहीं किए जाने पर गीतकार एवं शायर एएम तुराज प्रशासन से खफा हैं। उन्होंने कहा कि सात साल के बाद जिले में नुमाइश लगी। मुशायरा कमेटी ने उन्हें निमंत्रण देने तक की जहमत नहीं उठाई। सहारनपुर में दो साल पहले हुए मुशायरे में शिरकत की थी।
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