देश में लगातार बढ़ रहे चीनी उत्पादन और विश्व बाजार में गिरते दामों ने सरकार से लेकर शुगर इंडस्ट्री तक की नींद उड़ा दी है। किसानों को चालू पेराई सत्र का तो दूर अभी पिछले सत्र का भी गन्ना मूल्य बकाया भुगतान नहीं किया जा सका है। चीनी मिलों को गन्ना पेराई में भी पसीने आ रहे हैं।
देश में चीनी की घरेलू खपत 245 से 255 लाख टन है। दूसरी ओर लगातार बढ़ रहे गन्ना उत्पादन से चीनी का उत्पादन 300 टन पार कर गया है। इसके चलते करीब 60 लाख टन से ज्यादा चीनी का सरप्लस स्टॉक है। केंद्र सरकार ने इंडस्ट्री को राहत देने के लिए जहां चीनी की एमएसपी बढ़ाई है, वहीं चीनी निर्यात के लिए 3500 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी है। बावजूद इसके दिक्कत कम नहीं हो रही है। इससे गन्ना उत्पादक किसानों का संकट गहराने के आसार बढ़ गए हैं।
एथनॉल उत्पादन पर फोकस
गन्ने के रकबे और चीनी उत्पादन से निपटने के लिए केंद्र-प्रदेश सरकार ने काम शुरू किया है। खांडसारी को नई नीति के साथ ही एथनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए शीरे की बजाय सीधे गन्ने के रस एथनॉल की स्वीकृति दी गई है। मेरठ मंडल में दौराला, नंगलामल और ब्रजनाथपुर मिल ही बी हैवी शीरे से एथनॉल तैयार कर रही है। गन्ने के रस से कोई मिल एथनॉल नहीं बना रही है।
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तेल कंपनियों पर निर्भरता
एथनॉल का प्रयोग पेट्रोल-डीजल में ही होता है। तेल में ही एथनॉल की मिक्सिंग होती है। इसलिए एथनॉल का उत्पादन तेल कंपनियों पर निर्भर है। नई नीति के तहत प्रदेश में 40 से ज्यादा मिलें एथनॉल का उत्पादन कर रही है। तेल कंपनियां 10 फीसदी एथनॉल का मिश्रण तेल में कर रही है। देश में सी हैवी शीरे से ही एथनॉल बनाया जाता है।
सरकार की मदद का इंतजार
सरकार चीनी का उत्पादन संतुलित करने के लिए एथनॉल उत्पादन बढ़ाने पर तो बल दे रही है लेकिन मदद नहीं कर रही। अगर सरकार मदद करें तो बी हैवी शीरे के अलावा गन्ने के रस से भी एथनॉल बनाया जा सकता है।
- दीपक गुप्तारा, जनरल सेक्रेटरी, यूपी इसमा
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