बहुत से लोगों की मान्यता है कि महाभारत में वर्णित लाक्षागृह बरनावा में दफन है, जिसे कौरवों ने पांडवों को मारने के लिए बनाया था। इसके साथ ही सवाल यह है कि अखिर महाभारत का काल क्या है। बरनावा में चल रहे उत्खनन में अभी तक ऐसी कोई वस्तु नहीं मिली है जिससे महाभारत की कथा सच साबित होती हो। वैसे भी महाभारत का काल दक्षिणपंथ और वामपंथ के बीच बहस का विषय है। अभी वर्तमान में देश में तीन ऐसे स्थान हैं, जहां लाक्षागृह होने का दावा किया किया जाता है। पहला बागपत का बरनावा, दूसरा उत्तराखंड के जानसौर इलाके में लाखामंडल और तीसरा इलाहाबाद के पास कौशांबी जिले में लक्षागीर है।
पौराणिक कथा के अनुसार अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित के बाद पांचवीं पीढ़ी में निचक्षु के शासनकाल में जब हस्तिनापुर गंगा की बाढ़ से नष्ट हो गया। तब उन्होंने कौशांबी को राजधानी बनाया। हालांकि कथा के मुताबिक यह काल महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद का है। वहीं वाल्मीकि रामायण तथा महाभारत में कौशांबी की स्थापना का श्रेय ‘कुशाम्ब’ को दिया गया है।
मेरठ के इतिहासकार केके शर्मा ने बताया कि महाभारत की मूल रचना में 8000 श्लोक थे। तब यह जय संहिता के नाम से जाना जाता था। धीरे-धीरे इसमें और श्लोक जुड़ गए। तब इसे भारत के नाम से जाना जाने लगा। जब इसमें श्लोकों की संख्या करीब सवा लाख हो गई तब इसे महाभारत नाम मिला।
हालांकि यह कहना मुश्किल है कि इनमें से महाभारत के मूल और वास्तविक 8000 श्लोक कौन से थे। उन्होंने कहा कि महाभारत के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। इसमें वर्णित स्थानों, श्रुतियां और भूगोल आज भी मौजूद हैं। जहां आज लाक्षागृह होने की बात कही जाती है, वह वर्णावत आज भी मौजूद है। कौरवों और पांडवों के बीच समझौते के लिए पांडवों को जिन पांच गांवों को देने की बात कही गई है, वे पांच गांव आज भी मौजूद हैं। यह गांव वर्णावत, वृकस्थल (बागपत), कुरथल, माकंदी और आसंदी हैं।
महाभारत में वर्णित अवशेष कहां हैं...
महाभारत की संस्कृति की शैली और प्रयुक्त शब्दों को देखकर माना जाता है इसे ईसा पूर्व पहली शताब्दी में लिखा गया होगा। हालांकि कुछ इतिहासकार महाभारत का काल ईसा पूर्व 3320 साल पहले का मानते हैं। बी लाल ने हस्तिनापुर में मिले चित्रित धूसर मृदभांडों को महाभारत काल का माना है, लेकिन सवाल यह है कि महाभारत में वर्णित हाथी, घोड़ों, रथों, राजप्रासादों आदि के अवशेष कहां हैं। वैसे भी यहां बहुत ही संक्षेप हिस्से में उत्खनन हुआ है। ऐसी स्थिति में महाभारत का काल निर्धारण उचित प्रतीत नहीं होता। -प्रोफेसर इरफान हबीब, इतिहासकार
महाभारत को खारिज नहीं किया जा सकता
ऐतिहासिक रूप से महाभारत को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। इतिहास लेखन पुरातात्विक साक्ष्यों, साहित्य और मौखिक कथा, कहानियों को आधार बनाकर किया जाता है। यह सही है कि महाभारत काल के लिए जितना शोध होना चाहिए था, उतना नहीं हो पाया है। अभी इस दिशा में बहुत शोध जी करूरत है। कुछ इतिहासकार सरस्वती नदी को अस्तित्व को ही नकारते रहे हैं, जबकि हरियाणा में इसके आसपास कई बड़ी साइट मिली हैं, जहां मानव संस्कृति के अवशेष मिलते हैं। -के के शर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर एमएम कॉलेज मोदीनगर
पुरावशेषों का बड़ा गवाह है चंदायन
सिनौली की तरह ही बड़ौत के पास चंदायन का टीला प्राचीन इतिहास का बड़ा गवाह है। इसके नीचे महत्वपूर्ण पुरावशेष मिलने की पूरी संभावना है। कुछ साल पहले ग्रामीणों द्वारा मिट्टी निकले के जाने के दौरान एक मानव खोपड़ी और तांबे का मुकुट मिला था। इसके अलावा गैरिक और चित्रित धूसर मृदभांड पात्र भी मिले थे। हालांकि वह खोपड़ी कहां है इसका कुछ पता नहीं है। इस टीले के निजी जमीन पर होने के कारण बड़े पैमाने पर उत्खनन नहीं हो सका है। इसलिए उसके संरक्षण की जरूरत है। पहाड़ जैसे इस टीले की मिट्टी का प्रयोग अभी सड़क बनाने के लिए किए जाने की वजह से बड़ी संख्या पुरातात्विक साक्ष्य नष्ट हो चुके हैं और हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में इसको बचाया जाना बेहद जरूरी है ताकि प्राचीन इतिहास का पता लगाया जा सके।
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