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अमर उजाला कवरेज: एक क्लिक में जानें, महाभारतकाल के 'लाक्षागृह' का इतिहास

Tue, 13 Mar 2018 11:28 AM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, विजय नारायण सिंह, मेरठ
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लाक्षागृह टीला
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सिंधु घाटी की सभ्यता का प्रसार अफगानिस्तान, पाकिस्तान से लेकर भारत में पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान और गुजरात तक मिलता है। इस सभ्यता के सबसे पश्चिमी पुरास्थल पाकिस्तान में कराची से 480 किलोमीटर दूर इरान की सीमा के निकट स्थित सुत्कागेनडोर से लेकर मेरठ में आलमगीरपुर तक था। यह दूरी करीब 1600 किलोमीटर है। इसी तरह उत्तर में अफगानिस्तान सीमा पर रहमान ढेरी से लेकर दक्षिण में सूरत से 51 किलोमीटर हंसोत के भगतराव तक 1400 किलोमीटर में फैला था। इस तरह सिंधु सभ्यता भौगोलिक दृष्टि से विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसी 50 से अधिक साइट हैं, जहां हड़प्पाकालीन और उसके पुरावशेष दबे हुए हैं। इनमें से बहुत कम स्थानों पर ही उत्खनन हो पाया है। पश्चिम में अहिछत्र, नोह, अलीगढ़ के पास अतरंजीखेड़ा, आगरा के पास बटेश्वर, खलौआ, मेरठ के अल्लापुर और आलमगीरपुर प्राचीन संस्कृति के कुछ खास उदाहरण हैं। 

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सिंधु सभ्यता के समय आबाद था वेस्ट यूपी
करीब 4500 साल पहले जब सिंधु नदी के किनारे हड़प्पा मानव संस्कृति पूरी तरह विकसित थी, उस समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर भी सांस्कृतिक विकास हो चुका था। इसके साक्ष्य विभिन्न स्थानों पर हुई उत्खनन में सामने आए हैं। हालांकि अभी तक मिले साक्ष्यों के मुताबिक यहां की सांस्कृतिक विरासत हड़प्पा की तरह शहरी नहीं थी। जो कुछ भी मिला है, उससे लगता है कि यहां विकसित ग्रामीण संस्कृति रही होगी। प्रचुर मात्रा में मिले चित्रित धूसर मृदभांड, पशुओं की हड्डियां, करीने से बनीं कब्रें यह बताती हैं कि यहां के लोग औजारों के प्रयोग के साथ ही पशुपालन भी करते थे। यहां के लोग तांबे, सोने के उपयोग की तकनीक से भी परिचित थे। उसका इस्तेमाल भी करते थे। 

भारतीय पुरातत्व संस्थान भारतीय पुरातत्व दिल्ली के निदेशक संजय मंजुल ने बताया कि हिंडन नदी के किनारे बड़ी संख्या में ओसीपी (ओकर क्ले पॉट) यानि गेरुआ गैरिक मिट्टी के पात्र और पीजीडब्ल्यू (पेंटेड ग्रे पॉट) यानि चित्रित धूसर मृदभांड एवं अन्य बर्तनों की भरमार है। यह कह सकते हैं कि हिंडन के किनारे प्राचीन विकसित संस्कृति मौजूद थी। हालांकि यह बर्तन देश के कई अन्य हिस्सों में भी मिले हैं। ईसा पूर्व करीब 2200 साल यानि करीब 4200 साल पहले सिंधु और सरस्वती नदियों के सूखने के साथ ही हड़प्पा संस्कृति खत्म होने लगी। यहां रहने वालों ने संभवत: पूर्व की तरफ पलायन शुरू किया। हालांकि इस पलायन के बारे में कई तरह के तर्क दिए जाते हैं, लेकिन सबसे मजबूत तर्क के मुताबिक माना जाता है कि वहां जलवायु परिवर्तन के कारण गंभीर सूखा पड़ा। इसी वजह से हड़प्पा संस्कृति का विनाश हो गया। पुराविदों का मानना है कि जिस समय वहां विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हुई उसी समय यहां भी मानव संस्कृति विकसित हो चुकी थी। इसका प्रमाण मेरठ के आलमगीरपुर और बागपत के सिनौली में मिलता है। आलमगीरपुर को कई इतिहासकार पूरी तरह हड़प्पा के समकालीन मानते हैं। हिंडन के तट पर स्थित आलमगीरपुर सिंधु सभ्यता का सबसे पूर्वी स्थान है। सहारनपुर जिले के बड़गांव तथा हुलास की गणना भी परवर्ती सिंधु सभ्यता के पुरास्थलों में की जाती है। सिनौली में 2006-07 में हुए उत्खनन में ईसा पूर्व करीब 2200 साल से 1800 साल तक तीन चरणों के सांस्कृतिक अवशेष मिले हैं। हालांकि यहां मिले तमाम साक्ष्यों पर अभी भी शोध जारी है। 
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सूखे के कारण सिंधु घाटी छोड़ गंगा के किनारे बसने लगे थे लोग
नेचुरल हिस्ट्री के हालिया शोध से यह बात सामने आई है कि कई साल तक पड़े भीषण सूखे के कारण सिंधु और वैदिक सभ्यताएं समाप्त हो गईं। इसके साथ ही लोग गंगा घाटी के मैदानों में बसने लगे, जहां मानसून की पर्याप्त बारिश होती थी। कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता प्रोफेसर आशीष सिन्हा और गायत्री कठायत के मुताबिक 4500 साल पहले से लेकर 3850 साल के बीच जब तक मानसून अच्छा रहा तब तक सिंधु घाटी के किनारे सभ्यता फलती फूलती रही। लेकिन जैसे ही सूखा पड़ने लगा इस सभ्यता का अंत हो गया और लोग गंगा घाटी के मैदानों में बसने लगे। ऐसा ही 3400 साल पहले की वैदिक सभ्यता के साथ हुआ। 3100 साल पहले मानसून कमजोर पड़ने पर लोगों को पूर्व की ओर बढ़ना पड़ा। पहले हुए अध्ययनों में माना जाता था कि भारत की पुरातन सभ्यताएं किसी बड़े जलवायु परिवर्तन के कारण खत्म हुईं, लेकिन अब पता चला है कि कुछ साल के सूखे ने ही इन सभ्यताओं को समाप्त कर दिया। इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड की साहिया की गुफाओं को चुना क्योंकि यह वह क्षेत्र है, जहां मानसून आने और जाने के समय कमजोर पड़ जाता है। उन्होंने यहां गुफाओं में मौजूद कैल्साइट और जमा क्रिस्टल का अध्ययन किया। यह तत्व पानी और चूना की प्रतिक्रिया से बनता है। यानि इसमें पानी जितना ज्यादा होगा तत्व उतने ज्यादा होंगे। साल दर साल इसमें होने वाले बदलाव के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया।

पढ़ें : 'लाक्षागृह' की खुदाई में बाहर आने लगा इतिहास, मिली मानव हड्डी-दांत

महाभारत का लाक्षागृह कहां-बरनावा, कौशांबी या उत्तराखंड का लाखामंडल

उत्खनन जारी
बहुत से लोगों की मान्यता है कि महाभारत में वर्णित लाक्षागृह बरनावा में दफन है, जिसे कौरवों ने पांडवों को मारने के लिए बनाया था। इसके साथ ही सवाल यह है कि अखिर महाभारत का काल क्या है। बरनावा में चल रहे उत्खनन में अभी तक ऐसी कोई वस्तु नहीं मिली है जिससे महाभारत की कथा सच साबित होती हो। वैसे भी महाभारत का काल दक्षिणपंथ और वामपंथ के बीच बहस का विषय है। अभी वर्तमान में देश में तीन ऐसे स्थान हैं, जहां लाक्षागृह होने का दावा किया किया जाता है। पहला बागपत का बरनावा, दूसरा उत्तराखंड के जानसौर इलाके में लाखामंडल और तीसरा इलाहाबाद के पास कौशांबी जिले में लक्षागीर है। 

पौराणिक कथा के अनुसार अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित के बाद पांचवीं पीढ़ी में निचक्षु के शासनकाल में जब हस्तिनापुर गंगा की बाढ़ से नष्ट हो गया। तब उन्होंने कौशांबी को राजधानी बनाया। हालांकि कथा के मुताबिक यह काल महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद का है। वहीं वाल्मीकि रामायण तथा महाभारत में कौशांबी की स्थापना का श्रेय ‘कुशाम्ब’ को दिया गया है। 

मेरठ के इतिहासकार केके शर्मा ने बताया कि महाभारत की मूल रचना में 8000 श्लोक थे। तब यह जय संहिता के नाम से जाना जाता था। धीरे-धीरे इसमें और श्लोक जुड़ गए। तब इसे भारत के नाम से जाना जाने लगा। जब इसमें श्लोकों की संख्या करीब सवा लाख हो गई तब इसे महाभारत नाम मिला। 

हालांकि यह कहना मुश्किल है कि इनमें से महाभारत के मूल और वास्तविक 8000 श्लोक कौन से थे। उन्होंने कहा कि महाभारत के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। इसमें वर्णित स्थानों, श्रुतियां और भूगोल आज भी मौजूद हैं। जहां आज लाक्षागृह होने की बात कही जाती है, वह वर्णावत आज भी मौजूद है। कौरवों और पांडवों के बीच समझौते के लिए पांडवों को जिन पांच गांवों को देने की बात कही गई है, वे पांच गांव आज भी मौजूद हैं। यह गांव वर्णावत, वृकस्थल (बागपत), कुरथल, माकंदी और आसंदी हैं। 

महाभारत में वर्णित अवशेष कहां हैं...
महाभारत की संस्कृति की शैली और प्रयुक्त शब्दों को देखकर माना जाता है इसे ईसा पूर्व पहली शताब्दी में लिखा गया होगा। हालांकि कुछ इतिहासकार महाभारत का काल ईसा पूर्व 3320 साल पहले का मानते हैं। बी लाल ने हस्तिनापुर में मिले चित्रित धूसर मृदभांडों को महाभारत काल का माना है, लेकिन सवाल यह है कि महाभारत में वर्णित हाथी, घोड़ों, रथों, राजप्रासादों आदि के अवशेष कहां हैं। वैसे भी यहां बहुत ही संक्षेप हिस्से में उत्खनन हुआ है। ऐसी स्थिति में महाभारत का काल निर्धारण उचित प्रतीत नहीं होता। -प्रोफेसर इरफान हबीब, इतिहासकार

महाभारत को खारिज नहीं किया जा सकता 
ऐतिहासिक रूप से महाभारत को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। इतिहास लेखन पुरातात्विक साक्ष्यों, साहित्य और मौखिक कथा, कहानियों को आधार बनाकर किया जाता है। यह सही है कि महाभारत काल के लिए जितना शोध होना चाहिए था, उतना नहीं हो पाया है। अभी इस दिशा में बहुत शोध जी करूरत है। कुछ इतिहासकार सरस्वती नदी को अस्तित्व को ही नकारते रहे हैं, जबकि हरियाणा में इसके आसपास कई बड़ी साइट मिली हैं, जहां मानव संस्कृति के अवशेष मिलते हैं।           -के के शर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर एमएम कॉलेज मोदीनगर

पुरावशेषों का बड़ा गवाह है चंदायन
सिनौली की तरह ही बड़ौत के पास चंदायन का टीला प्राचीन इतिहास का बड़ा गवाह है। इसके नीचे महत्वपूर्ण पुरावशेष मिलने की पूरी संभावना है। कुछ साल पहले ग्रामीणों द्वारा मिट्टी निकले के जाने के दौरान एक मानव खोपड़ी और तांबे का मुकुट मिला था। इसके अलावा गैरिक और चित्रित धूसर मृदभांड पात्र भी मिले थे। हालांकि वह खोपड़ी कहां है इसका कुछ पता नहीं है। इस टीले के निजी जमीन पर होने के कारण बड़े पैमाने पर उत्खनन नहीं हो सका है। इसलिए उसके संरक्षण की जरूरत है। पहाड़ जैसे इस टीले की मिट्टी का प्रयोग अभी सड़क बनाने के लिए किए जाने की वजह से बड़ी संख्या पुरातात्विक साक्ष्य नष्ट हो चुके हैं और हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में इसको बचाया जाना बेहद जरूरी है ताकि प्राचीन इतिहास का पता लगाया जा सके।

पढ़ें : अब उठेगा पांडवों के 'लाक्षागृह' के सबसे बड़े राज से पर्दा, खुदाई शुरू

सहारनपुर में एक दर्जन से अधिक साइट

सहारनपुर के हुलास में हुए उत्खनन का दृश्य, फाइल फोटो
सहारनपुर में भी प्राचीन एक दर्जन से अधिक साइट हैं जिनमें से कुछ पर पुरातत्व विभाग ने काम भी किया है। जांच में यहां गंगा घाटी और सिंधु कालीन संस्कृति का पता चला है। सबसे पहले 1978-79 में गंगोह छेत्र के हुलास में प्राचीन टीले पर उत्खनन किया गया। यह उत्खनन प्रोफेसर काशीनाथ की देखरेख में हुआ इसमें मिट्टी के बर्तन, चूड़ियां, आभूषण, ईटें आदि वस्तुएं मिलीं। टीले का 50 फीसदी हिस्से में उत्खनन होना शेष है।

सकतपुर का इतिहास 4000 साल पुराना 
साल 2016-17 में रामपुर मनिहारान क्षेत्र के गांव सकतपुर में उत्खनन किया गया। यहां ईसा पूर्व 2000 साल यानि 4000 साल पुराने पुरावशेष मिले हैं। उत्खनन का यह कार्य आगरा क्षेत्र के अधिकारियों की देखरेख में हुआ। यहां पर भी हड्डी के टुकड़े, सिलबट्टे, मनके , मिट्टी के पात्र और कई अन्य तरह की वस्तुएं मिलीं। इन पर शोध चल रहा है। प्रथमदृष्टया यहां गंगा घाटी की संस्कृति का पता चला है। इसी तरह सहारनपुर जनपद में अभी तक दो जगहों पर उत्खनन किया गया है, जहां सिंधु कालीन संस्कृति और गंगा घाटी की संस्कृति का पता चला है। शोधार्थी राजीव उपाध्याय यायावर के अनुसार जनपद में और भी ऐसी साइट हैं जिनके उत्खनन की जरूरत है। इनमें सरसावा का टीला प्रमुख है जिसको लोगों ने चौतरफा काटना शुरू कर दिया है। इस टीले की ऊंचाई लगभग 40 से 45 फीट है और इसका क्षेत्र 10 से 12 बीघा है। टीले के ऊपर लोगों को काफी चीजें मिलती रही हैं, जिनमें मिट्टी के बर्तन, पशुओं की हड्डियां और अन्य चीजें शामिल हैं। इनके अलावा और भी 6 से 7 साइट हैं। हुलास भी एक प्रमुख पुरातात्विक स्थल है। हालांकि सरसांवा में अभी तक उत्खनन नहीं हुआ है। संभावना है कि इस टीले के नीचे महत्वपूर्ण पुरावशेष दबे हैं। स्थानीय लोगों द्वारा मिट्टी उठाने की वजह से इसके अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है।

सिनौली में पुन: उत्खनन शुरू

सिनौली में मिले मिट्टी के पात्र। फाइल फोटो
सिनौली में 2006-07 के बाद एक बार फिर उत्खनन शुरू हुआ है। यह उत्खनन पूर्व में हुए उत्खनन स्थल के बगल में ही है। पूर्व में मिली बड़ी कब्रगाह के बाद कुछ और नए तथ्यों के प्रकाश में आने की उम्मीद है। बृहस्पतिवार को यहां ठीक वैसी ही एक और तलवार मिली है, जैसी पूर्व में हुए उत्खनन में मिली थी। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन विभाग द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्थान लालकिला की टीम यह उत्खनन करा रही है। संस्थान के निदेशक संजय मंजुल की निगरानी में एक बड़ी टीम इस कार्य में लगी है। 

सिनौलीवासी तांबे और सोने की तकनीक से थे परिचित
पुरातत्व संस्थान भारतीय पुरातत्व के निदेशक संजय मंजुल ने बताया कि सभी कब्रें उत्तर-दक्षिण दिशा में हैं। इनमें से 35 तीर जैसे तांबे के औजार मिले हैं। साथ ही कई आभूषण भी मिले हैं। इनमें सोने और तांबे के बैंगल हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि यहां रहने वाले सोना और तांबे की तकनीक से पूरी तरह वाकिफ थे, और विभिन्न तरह से उसका इस्तेमाल भी करते थे। कब्रों के साथ ही 50 गुणा 50 मीटर की लंबाई और चौड़ाई में ईंट की दीवार भी मिली है, जो 24 सेंटीमीटर मोटी है। यहां मिलीं करीने से बनीं 125 कब्रें सबसे खास हैं। यह कब्रें भी कई काल चरणों की हैं। इनमें से 18 कब्रों में नरकंकाल भी मिले हैं। इनमें महिलाओं पुरुषों के साथ ही कुछ नवजात बच्चों के भी हैं। कुछ कब्रों के साथ एक स्टैंड पर रखा तांबे के कंटेनर भी मिले हैं। कब्रों में मिले कंकालों को देखकर लगता है कि उनके अंतिम संस्कार की परंपरा आज जैसी ही थी। जैसे नवजात बच्चे को आज भी दफनाया जाता है और तब भी दफनाया जाता था। इनमें से कुछ कब्रें प्रतीकात्मक भी है। जैसे आज भी किसी परिवार के किसी व्यक्ति के लापता हो जाने की स्थिति में उसका प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार किया जाता है वैसी ही परंपरा तब भी थी, और यह परंपरा आज तक चली आ रही है।

कंकालों पर शोध अभी बाकी
यहां मिले कंकालों पर एंथ्रोपोलोजी सर्वे ऑफ इंडिया को शोध करना था, लेकिन 2006 से अब तक उसने अपनी कोई भी रिपोर्ट भारतीय पुरातत्व सर्वे को नहीं सौंपी है। उम्मीद है कि इन कंकालों में डीएनए के कुछ नमूने मिल सकते हैं। डीएनए शरीर के कुछ खास हिस्सों में प्रचुर मात्रा में मिल सकता है, क्योंकि इन कंकालों में कुछ तो पूरे हैं। नमूनों की जांच से उनके जेनेटिक विकास क्रम का पता लगाया जा सकता है। इनकी जांच से यह भी पता लगाया जा सकता है कि वर्तमान में इस इलाके में रहने वाले लोग क्या उस समय यहां रहने वालों के ही वंशज हैं या उनके जेनेटिक क्रम में कोई साम्यता है। हालांकि कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि इन कब्रों में बरसात का पानी और खेतों में उपयोग की जाने वाली रासायनिक खादों के जाने से डीएनए प्रदूषित हो चुका होगा, इसलिए नमूनों की जांच बहुत स्पष्ट नहीं हो सकती।
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दातों से होती है जांच

सिनौली में मिले कंकाल, स्वर्ण आभूषण।
दांतों की रासायनिक जांच से पता लगाया जा सकता है कि यहां रहने वाले शाकाहारी थे या मांसाहारी या दोनों। उन्होंने किस-किस तरह की जलवायु को झेला। वे विपरीत हालातों में भी अपने को कैसे जीवित रख पाए होंगे। दांतों से ही किसी भी जीव की पूरे प्राकृतिक इतिहास का पता लगाया जा सकता है

सवाल कहां रहते थे लोग
करीने से बनी इन कब्रों से सवाल उठता है कि यदि इतना बड़ा कब्रिस्तान मौजूद था तो सिनौली के आसपास बड़ी संख्या में आबादी भी रही होगी, जो गांव या कस्बे की तरह की रही होगी। आखिर वह स्थान कहां है। इसका अभी पता लगाया जाना बाकी है। संजय मंजुल का कहना है कि इसके लिए एक व्यापक सर्वेक्षण की जरूरत है।

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