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सीडीओ के आदेश का भी नहीं हुआ पालन, स्टाफ न होने की वजह से 10 जिलों के मरीज परेशान

Tue, 20 Dec 2016 12:55 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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सिस्टम की लचर व्यवस्था के बीच लाला लाजपत राय मेमोरियल मेडिकल कालेज में संचालित 40 बेड के दो डीआरटीबी (ड्रग रजिस्टेंट ट्यूबर क्लॉसिस) सेंटर बंद पड़े हैं। छह महीने से 10 जिलों के डीआरटीबी के मरीजों को इलाज नहीं मिल पा रहा है। औपचारिकता के लिए गिने-चुने मरीजों को भर्ती किया जा रहा है। सेंटर के नाम पर स्टाफ को समायोजित किया गया है, लेकिन उनकी सेवाएं किसी दूसरे स्वास्थ्य केंद्र पर ली जा रही हैं। जिला क्षय रोग विभाग स्टाफ मांग रहा है। वहीं लखनऊ मुख्यालय में निदेशक नेशनल हेल्थ मिशन और जिला प्रशासन की तरफ से सीडीओ विशाख डी. सीएमओ को तत्काल आठ स्टाफ नर्स उपलब्ध कराने का आदेश दे चुके हैं। लेकिन उनके आदेश पर भी ध्यान नहीं दिया गया। हालात जस के तस हैं।  
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सरकारी सिस्टम में किस तरह से खेल होता है, इसका एक बड़ा उदाहरण दोनों डीआरटीबी सेंटरों पर स्टाफ नर्स की तैनाती को लेकर देखा जा सकता है। दरअसल 20 बेड के सेंटर पर चार स्टाफ नर्स, एक असिस्टेंट, एक काउंटर और एक सीनियर मेडिकल ऑफिसर की तैनाती होती है। अब मेडिकल कालेज में दो सेंटर संचालित हैं, जिनमें आठ स्टाफ नर्स की तैनाती थी। लेकिन अप्रैल 2016 में केंद्र सरकार ने इन्हें फंड देना बंद कर दिया। क्योंकि यह प्रोग्राम केंद्र सरकार का है और केंद्र से आने वाले अनुदान पर ही स्टाफ नर्स की तैनाती होती है। इसके बाद आठों स्टाफ नर्स कोर्ट चली गईं, जिसके बाद केंद्र सरकार से जवाब तलब किया गया। केंद्र ने कोर्ट में पक्ष रखा कि अगर यह प्रोग्राम चलाना जरूरी है तो यूपी सरकार इन पदों को नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) में समायोजित कर ले।

ऐसे में कोर्ट ने यूपी सरकार से जवाब मांगा, जिसके बाद मिशन निदेशक ने सभी सीएमओ को निर्देश दिया कि वो इन सभी स्टाफ नर्स को एनएचएम में समायोजित कर लें। निदेशक ने डीजी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के माध्यम से आदेश जारी कराया, लेकिन तत्कालीन सीएमओ डॉ. रमेश चंद्रा ने उस पर कोई तवज्जो नहीं दी। लंबे समय तक डॉ. रमेश चंद्रा ने समायोजन नहीं किया। इसके बाद डीजी ने मुख्यालय स्तर से समायोजित कर उन्हें ज्वाइन कराने का निर्देश दिया। लेकिन किसी कारण डीजी यह लिखना भूल गए कि समायोजन कर डीआरटीबी सेंटर पर तैनात किया जाए। इसका फायदा उठाकर सीएमओ ने आठ स्टाफ नर्स को स्वास्थ्य केंद्र और चिकित्सालय में भेज दिया। जुलाई में इनका समायोजन कर ज्वाइनिंग हुई, लेकिन डीआरटबी सेंटर कोई नहीं पहुंची।
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आदेशों का पालन नहीं
15 अक्तूबर को हुई जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक में जिला क्षय रोग विभाग की तरफ से यह मामला उठाया गया। कहा कि अभी तक मेडिकल कालेज के स्टाफ पर ही गिने-चुने मरीजों की भर्ती हो रही है। बाकी को वापस भेजना पड़ा रहा है। इस पर सीडीओ विशाख डी. ने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिया कि तत्काल डीआरटीबी सेंटर पर स्टाफ नर्स भेजी जाएं, लेकिन आज तक स्वास्थ्य विभाग ने किसी स्टाफ नर्स को नहीं भेजा। उधर, सेंटर के सीनियर मेडिकल ऑफिसर डॉ. जेपी शर्मा ने सीएमओ को पत्र लिखकर स्टाफ की मांग की है। डॉ. जेपी शर्मा का कहना है कि हम लोग लगातार अपील कर रहे हैं कि सेंटर के लिए स्टाफ दे दिया जाए, जिससे मरीजों को भर्ती किया जा सके। लेकिन अभी तक इस पर ध्यान तक नहीं दिया गया है।


क्या है डीआरटीबी मरीज
किसी मरीज में टीबी का पता चलने ही उसका इलाज शुरू होता है। चिकित्सक के परामर्श अनुसार इसका महीनों तक इलाज चलता है। यदि मरीज बीच में दवा खानी बंद कर देता है और वह ऐसा एक या इससे ज्यादा बार करे, तो उस पर टीबी का आम दवाएं असर करना बंद कर देती है। ऐसे मरीज को ड्रग रजिस्टेंट या मल्टी ड्रग रजिस्टेंट टीबी मरीज कहते हैं। ऐसे मरीजों को डीआरटीबी सेंटर लाया जाता है।
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मेरठ मेडिकल से इन दस जिलों के मरीज जुड़े हैं
मेरठ
बुलंदशहर
गाजियाबाद
हापुड़
गौतमबुद्धनगर
बागपत
सहारनपुर
मुजफ्फरनगर
शामली
बिजनौर
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