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Meerut News: लाल रिबन की लहर, पर कलंक अभी बाकी

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मेरठ। एचआईवी और एड्स से बचाव के लिए लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाए जाते हैं। रैलियां, सेमिनार और शिविर लगाए जाते हैं मगर अभी भी लोग इसे कलंक मानते हैं। बीमारी छिपाते हैं। मरीज अकेलेपन में जीता है। हालांकि समय रहते इलाज कराने से वह बेहतर जीवन जी सकता है। लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरूक करने के लिए हर साल एक दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है।
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एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज में अप्रैल 2024 से नवंबर 2025 तक जिले में 182 नए एचआईवी पॉजिटिव केस सामने आए हैं। इनमें 69 प्रतिशत पुरुष और 31 प्रतिशत महिलाएं हैं। यहां एंटी रेट्रो वायरल थेरेपी (एआरटी) सेंटर में एचआईवी का इलाज साल 2005 में शुरू हुआ था। तब से अब तक यहां करीब साढ़े 13 हजार लोगों का इलाज हो चुका है। फिलहाल यहां 4312 मरीजों की उपचार चल रहा है। इनमें सबसे ज्यादा प्रभावित आयु वर्ग 25-34 वर्ष का है। कुछ मरीज 60-70 साल उम्र वाले भी हैं। कुछ ट्रांसजेंडर समुदाय के भी हैं।
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और जागरूकता की जरूरत
एचआईवी-एड्स के प्रति अभी और रेड रिबन की जरूरत है। रेड रिबन एड्स जागरूकता का अंतरराष्ट्रीय प्रतीक है। जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं लेकिन अभी भी समाज में एचआईवी पॉजिटिव लोगों के प्रति भेदभाव, तिरस्कार और कलंक की भावना अभी भी बरकरार है। यह सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। - डॉ. आरसी गुप्ता, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज
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एचआईवी और एड्स में का फर्क समझें
मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी लैब के प्रभारी डॉ. अमित गर्ग ने बताया कि ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (एचआईवी) और एक्वायर्ड इम्यूनोडेफिशिएंसी सिंड्रोम (एड्स) में फर्क है। एचआईवी एक वायरस है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को नष्ट करता रहता है। जैसे ही वायरस शरीर में प्रवेश करता है व्यक्ति एचआईवी पॉजिटिव हो जाता है। अगर समय पर इलाज शुरू हो जाए तो वह एड्स स्टेज तक नहीं पहुंच पाता। एड्स तब होता है जब एचआईवी को बिना इलाज के 8-10 साल गुजर जाते हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। फिर जो बीमारी होती है वह ठीक नहीं हो पाती है।
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एचआईवी के मुख्य कारण

- असुरक्षित शारीरिक संबंध
- एक ही सुई से नशा करने वाले युवा
- एचआईवी पॉजिटिव गर्भवती से नवजात शिशु को संक्रमण

इलाज
- एआरटी सेंटर में एचआईवी-एड्स की दवा सरकार पूरी तरह मुफ्त देती है।
- रोज एक या दो गोली लेनी होती हैं।
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