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मदर्स डे की स्टोरी

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मदर्स डे पर विशेष
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गम भूलाकर बच्चों के लिए कवच बनी माताएं
मेरठ। संघर्ष का दूसरा नाम है मां। मां ही है जो अपने दुखों को भूलकर बच्चों के लिए हर पल जीती है। अपने गम छिपाकर बच्चों के लिए हंसती है। जब अपने जीवन में परेशानियां आई तो बच्चों को उन परेशानियों से बचाने के लिए मां रक्षा कवच बनकर खड़ी हो गई। आज मदर्स डे के अवसर पर शहर की ऐसी सिंगल मदर की कहानी, जिन्होंने पति का साथ छूटने के बाद भी हार नहीं मानी। बल्कि बच्चों की खातिर वे आगे बढ़ी, हालात से लड़ी और सफल हुई...

1. बच्चों की खातिर भूला पति के गुजरने का गम
आदर्श नगर निवासी चांदनी एक सफल बिजनेस वुमन और दो बच्चों की सिंगल मदर हैं। चांदनी कहती हैं बेटा चार साल और बेटी कुल नौ साल की थी, जब उनके पति का देहांत हो गया। पति के गुजरने के कुछ समय बाद माता-पिता भी चल बसे। एक बार लगा कि अब मेरे ही जीने का क्या मतलब तभी अपने बच्चों की सूरत दिखी। पति की आखिरी निशानी ये बच्चे ही हैं, इन्हें छोड़कर मैं कै से जा सकती हूं। बस उसी दिन से बच्चों के लिए जीने लगी। अपना काम शुरू किया और हिम्मत करके आगे बढ़ती गई। इस पूरे सफर में मेरे सास-ससुर ने पूरा सहयोग किया। आज भी वो मुझे बेटी से ज्यादा प्यार करते हैं।
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2. पति के गुजरने के बाद की पढ़ाई, बनी टीचर
सी ब्लॉक शास्त्रीनगर निवासी सनबीम स्कूल की शिक्षिका युव्रानी त्यागी की शादी के पांच साल बाद उनके पति की मौत हो गई। बेटा ढाई साल और बेटी कुल साढ़े तीन साल की थी। बारहवीं के बाद ही शादी हो गई थी, इसलिए उम्र भी बहुत कम थी। कई लोगों ने कहा कि दूसरी शादी कर लो, लेकिन कोई ऐसा परिवार नहीं मिला जो मेरे दोनों बच्चों को स्वीकार करें। बच्चे मुझसे जुदा न हो जाएं इसलिए मैंने दोबारा शादी का विचार छोड़कर खुद ही बच्चों को पालने का निर्णय लिया। परिवार के सहयोग से पढ़ाई की, अब बीएड कर रही है। प्राइवेट स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हैं।


3. बेटी की खातिर छोड़ा पति, बनी सिंगल मदर
शास्त्रीनगर निवासी प्रीति वर्मा समाज मे ंएक सशक्त सिंगल मदर की मिसाल है। जिसने कुल सात महीने की बेटी को साथ लेकर पति का साथ छोड़ दिया। प्रीति कहती हैं पति में कुछ गलत आदतें थी। बेटी का भविष्य को लेकर उन्हें कई बार समझाया। लेकिन वह नहीं माने। पति से अलग होने के बाद ब्यूटीपार्लर सीखा। आज एक सफल ब्यूटीशियन हैं। बेटी का सारा खर्चा उठाती हैं। बुरे वक्त में सबसे ज्यादा सहयोग मेरी मम्मी और बहनों का मिला, जिन्होंने हर कदम पर मेरा साथ दिया।


4. चार बच्चों को पाला और बनाया सफल
शशिप्रभा अग्रवाल ने पति के गुजरने के बाद न केवल परिवार संभाला बल्कि चार बच्चों को पाला, बड़ा किया। आज तीनों बेटियों की शादी हो चुकी है। बेटा डॉ. शांतनु चिकित्सक हैं। शशिप्रभा एक सफल सिंगल मदर होने की कहानी कहती हैं। बेटा 13 साल का था, उसके बाद तीन छोटी बेटियां थीं। परिवार ने कहा दूसरी शादी कर लो, फिर बच्चों का ख्याल आया। बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। इन्हें पिता और माता दोनों का प्यार दिया।

5. बच्चों के लिए हालात से लड़कर हुई सफल
राजेंद्र नगर निवासी ममता अग्रवाल एक सफल मां और गृहिणी हैं। ममता और उनक ा पति आज से लगभग 20 साल पहले अलग हो गए। ममता बताती हैं हमारी आपस में बनी नहीं, तो हमारा रिश्ता खत्म हो गया। तब मेरे दोनों बच्चे बहुत छोटे थे। मैं अलग तो हो गई लेकिन दो बच्चों का लालन-पालन बड़ी चुनौती थी। क्या करूं, कहां जाऊं कुछ नहीं सूझा। मैंने अपना काम शुरू किया। बच्चों को कभी मायके में नहीं रखा जिससे बच्चों को कभी हीनभावना महसूस न हो। इसलिए शुरू से अलग रहकर बच्चों को बड़ा किया। आज ममता की बेटी प्रियंका अग्रवाल सफल एडमिनस्ट्रेटर है। बेटा दिल्ली में जॉब करता है।

6. विवाद ने छुड़ाया पति क ा साथ
शास्त्रीनगर के ब्लॅाक निवासी शोभा शर्मा एक सफल मां और शिक्षिका हैं। पिछले कई सालों से अकेले दम पर बेटी क ा पालन कर रही हैं। बेटी कुल ढाई साल की थी जब पति की गलत आदतों के चलते उनसे अलग होना पड़ा। मैंने पीएचडी की और शिक्षिका बन गई। पिछले 36 सालों से टीचिंग प्रोफेशन में हूं। अब प्रधान रामदयाल कॉलेज ऑफ हायर एजुकेशन कॉलेज में प्रिंसिपल हूं, साथ ही विद्या मंदिर में पढ़ाती हूं।
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1914 से मना रहे मदर्स डे
मदर्स डे मनाने की शुरूआत 18 मई 1914 को हुई थी। अमेरिक ी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने ज्वाइंट रिजॉल्यूशन पर हस्ताक्षर करके की थी। तभी से हर साल मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाने लगा। लेकिन इस दिन को मनाने का सुझाव 1872 में सामाजिक कार्यकर्ता कवि जुलिया वार्ड ने दिया था। पहले इस दिन को जून में मनाने की बात हुई। बाद में दिवस बदलकर मई के दूसरे रविवार को मनाना तय हो गया। अमेरिका के अन्ना जार्विस को मदर्स-डे का जनक माना गया। अन्ना जार्विस को यह प्रेरणा बचपन में अपनी मां अना मैरी रीब्ज जार्विस से मिली थी।

खास बातें:
- शहर की मांओं ने लिखी संघर्ष की कहानी
- बच्चों के जीवन में निभाई माँ के साथ पिता की भूमिका
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