सूबे में सरकारी चिकित्सा संस्थानों की खराब हालत पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक को लखनऊ में तीखी प्रतिक्रिया देनी पड़ी हो तो ऐसे में समझा जा सकता है कि धरातल पर हालत कैसे होंगे। मेरठ जैसे संपन्न जिले में लोगों तक सरकारी चिकित्सा सुविधाएं नहीं पहुंच रही है। क्योंकि जिले में बैठी स्वास्थ्य विभाग की मशीनरी को केवल भर्ती करने, अटैचमेंट और सुख सुविधाएं भोगने की बीमारी लग चुकी है। जिसका नतीजा है कि अपने घटिया प्रदर्शन से फरवरी माह में जिला स्वास्थ्य विभाग प्रदेश के 75 जिलों में से 72वें स्थान पर रहा है।
इस लचर प्रदर्शन से मेरठ प्रदेश के उन पांच जिलों की श्रेणी में आकर खड़ा हो गया है जो सबसे ज्यादा बीमारू हैं, यानी जिनका प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। शासन में बैठे उच्च अधिकारियों ने सख्त हिदायत दी है कि अब एक्शन होगा। क्योंकि जिला स्तर पर कोई खास काम नहीं हो रहा है। दरअसल स्वास्थ्य मुख्यालय की तरफ से हर माह नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) से जुड़ी प्रोग्रेस रिपोर्ट तैयार की जाती है। जो यह बताने के लिए काफी है कि जिले में किस स्तर पर काम हो रहा है।
क्या कहती है रिपोर्ट
रिपोर्ट के अनुसार मेरठ मदर एंड चाइल्ड पोर्टल पर पंजीकरण से लेकर संस्थागत प्रसव, टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की पहचान करने तक के मामले में पिछड़ गया है। साथ ही एनएचएम से जारी बजट को भी विभाग खर्च नहीं कर पाया। यह हालात तब हैं, जब मंडल के छह जिलों में सबसे ज्यादा चिकित्सक यहां सेवारत हैं। बुलंदशहर क्षेत्रफल व ब्लॉक के नजरिये से मेरठ से कहीं ज्यादा बड़ा है। वहां चिकित्सक मेरठ की तुलना में करीब 25 कम है लेकिन उसके बाद भी 34 वें स्थान पर रहा है।
19.9 फीसदी बजट ही खर्च
रिपोर्ट बताती है कि एनएचएम से मिले बजट की तुलना में सिर्फ 19.9 प्रतिशत ही खर्च हो पाया है। वहीं रूटीन टीकाकरण के लिए उपलब्ध बजट में से भी सिर्फ 43 फीसदी पैसा खर्च हो पाया। हालांकि अपने फायदे के चलते कंस्ट्रक्शन वर्क पर 89.1 प्रतिशत बजट जरूर खर्च डाला।
नहीं पकड़ी जा रही नब्ज
पूर्व सीएमओ डॉ. अमीर सिंह, डॉ. रमेश चंद्रा से लेकर वर्तमान सीएमओ का फोकस सिर्फ भर्ती करने पर रहा है। जबकि धरातल पर चिकित्सा सुविधाएं बेहतर करने के लिए कोई खास कदम नहीं उठाए गए। डॉ. वीपी सिंह को सीएमओ का चार्ज संभाले लंबा वक्त हो गया है। लेकिन उसके बाद भी स्वास्थ्य केंद्रों की हालत नहीं सुधरी है। विभाग का बड़ा स्टाफ अपनी सुविधा के हिसाब से दूसरे विभागों या अफसरों के आवास से अटैच है। जबकि एडिशनल पीएचसी पर स्टाफ नहीं है और स्वास्थ्य उप केंद्र की तरफ कोई नहीं झांकता।
शासन स्तर पर शर्मिंदगी
स्वास्थ्य विभाग के इसी घटिया प्रदर्शन के चलते जिला प्रशासन को भी शासन स्तर पर खासी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है। क्योंकि शासन में जिले वाइज भी कल्याणकारी योजनाओं की समीक्षा होती है, जिसके बाद हर जिले की रैंक निर्धारित की जाती है।