डबल गांव के दूषित जल ने ग्रामीणों की जिंदगी बर्बाद कर दी है। चेहरा खराब होने के कारण किसी की पढ़ाई छूट गई है, तो कोई खुजली की मार से परेशान है। 35 सौ की आबादी वाले गांव में कोई घर ऐसा नहीं है जहां बीमारी न हो। लोग किसी न किसी रोग से पीड़ित हैं।
ग्राम प्रधान नरेश त्यागी बताते हैं कि गांव में कोई बाहरी आदमी आता है तो वह पानी नहीं पीता है। रिश्तेदारों ने इसलिए आना छोड़ दिया है। पानी में हाथ डालते ही सप्ताह भर में शरीर काला होकर दाने उठ जाते हैं।
बदबू में रहना मुश्किल है, सांस में जहरीली गैसें पेट में जाती हैं। कोई अधिकारी या नेता आता है तो अपना पानी साथ लाते हैं। 10वीं के छात्र अक्षय के पूरे चेहरे पर लाल चकते और फुंसी हो गई हैं। बकौल अक्षय इन फुंसियों में इतना दर्द रहता है कि पढ़ाई में मुश्किल होती है।
इलाज के बाद भी यह ठीक नहीं हो रहीं। इसी तरह विकास के चेहरे पर भी प्रदूषित जल से एलर्जी हो गई है। 10वीं पास राधा के गले में दो साल से दर्द रहता है। इसके मजदूर पिता कहते हैं डॉक्टर ने इसे कैंसर बताया है। पहले हापुड़, मेरठ दोनों जगह दिखाया, ठीक नहीं हुई।
अब दिल्ली में इलाज चल रहा है। राधा आगे पढ़ना चाहती हूं, मगर सिरदर्द के कारण पढ़ नहीं पाती। गले दर्द के कारण बहुत ज्यादा बोलने में दिक्कत है। इसलिए पढ़ाई छूट गई है। आशा के पूरे शरीर में खुजली हो गई है।
तमाम इलाज कराने के बाद भी राहत नहीं है। डॉक्टर ने बताया जब तक पानी नहीं बदलेगा ये ठीक नहीं होगी। उसके पति अशोक को भी यही बीमारी लग गई है। विनोद भी त्वचा की बीमारी से जूझ रहा है। पानी में मिली हैवी मेटल्स के कारण शरीर पर लाल चकते और दाने उभर आए हैं, जो ठीक नहीं होेते। उसके दोस्त मजाक उड़ाते हैं।
कलम बनी आवाज
डॉ. विनोद कुमार 2005 में गले के कैंसर के कारण आवाज खो चुके हैं। दो बेटों के पिता विनोद आर्थिक संकट और सामाजिक इज्जत दोनाें से जूझ रहे हैं। हर समय अपने साथ कागज, कलम रखते हैं। कोई भी बात हो लिखकर ही बताते हैं।
वे बताते हैं कि पहले गले में फोड़ा बना, बाद में पता चला कि कैंसर हो गया है। एम्स में इलाज चला तो डॉक्टरों ने ऑपरेशन कर दिया और आवाज ही चली गई। अब कलम ही मेरी आवाज है। ट्रेन, बस कहीं भी जाऊं लिखकर टिकट लेता हूं। बाजार में या बाहर जाने पर अपने साथ एक अटेंडेट लेकर जाता हूं।
गले को खाने पर उतारू कैंसर
रिपुदमन भी 2005 से जीभ के कैंसर से पीड़ित हैं। दिल्ली लोकनायक अस्पताल में 10 सालों से इलाज चल रहा है। परिवार को आस है कि एक दिन वह ठीक होकर पहले जैसे हो जाएंगे। लेकिन जीभ से शुरू हुआ कैंसर आज गले तक आ पहुंचा है।
डॉक्टरों ने इशारा कर दिया है, अगर ऑपरेशन कराया तो ताउम्र के लिए आवाज चली जाएगी। आवाज खोने के डर से रिपुदमन कीमोथैरेपी से काम चला रहे हैं। वह कहते हैं ऑपरेशन, इलाज दोनों रास्ते मेरे लिए बंद हैं। मन की शांति के लिए इलाज करा रहा हूं। बीमारी ने मुझे आर्थिक तौर पर तोड़ दिया है।
ये भी हैं मरीज
सतीश गले के कैंसर से पीड़ित हैं, बोल नहीं पाते। हरिराम सिंह बेदी, अतर सिंह, विपिन कुमार, जोधराव, राजेंदर, परमानंद, बख्तावर भी गले के कैंसर से जूझ रहे हैं।
इलेक्ट्रानिक डिवाइस भी फेल
नदी में प्रदूषण के कारण लोगों के मोबाइल, टीवी, म्यूजिक सिस्टम जैसे इलेक्ट्रानिक डिवाइस भी एक साल में फेल हो जाते हैं। नदी में पड़े कचरे से निकलने वाली सल्फर, नाइट्रोजन गैस वायुमंडल में ऑक्सीजन से क्रिया करके खतरनाक ऑक्साइड में तब्दील होकर इलेक्ट्रानिक डिवाइसों को खराब कर देते हैं। डिवाइसों को खोलने पर उनमें कार्बन की मोटी परत जमा निकलती है। लोहे के दरवाजे, खिड़कियां भी जंग खाकर खराब हो रहे हैं।
सुख जननी आज मौत की वजह
काली नदी का पानी पहले से इतना प्रदूषित नहीं था। ग्रामीण बताते हैं पहले नदी में गंगनहर का पानी चलता था, जिसके कारण नदी के पानी में फ्लो था। सारी गंदगी बह जाती थी। पानी इतना साफ था कि हम लोग खूब नहाते थे। कुछ साल पहले नहर का पानी रोक दिया है, इससे सड़न फैल रही है।
महिलाओं ने छोड़े गहने
पानी में भारी मात्रा में सल्फर, लेड के तत्व मिले हैं। इसके चलते पानी इतना प्रदूषित है कि चांदी के आभूषण 7 दिन में गिलट और लोहे की तरह काले पड़ जाते हैं। महिलाओं ने गहने पहनने ही छोड़ दिए हैं।
गांव पर एक नजर
गांव का नाम- डबल, शाहपुर ब्लॉक, खतौली से 22 किमी स्थित
कुल परिवार- 200
जनसंख्या - 3500
जल का स्रोत - हैंडपंप
पांच सालों में कैंसर से मौत - 42
काली नदी से सटा गांव
प्रदूषण का कारण - इंडस्ट्रियल वेस्ट, पेपर मिल, हैवी मेटल्स, शुगर इंडस्ट्री वेस्ट
बीमारियां - गले का कैंसर, टीबी, दमा, स्किन कैंसर, आंतों का कैंसर, उल्टी, दस्त, बांझपन, खुजली, स्किन एलर्जी, ब्लड कैं सर, पाचन तंत्र में खराबी, न्यूरोलॉजिकल डिसीस के अलावा पशुआें में बांझपन और दूध देने की क्षमता भी घटी है।