भारतीय संस्कृति धर्म प्रधान : मुनिश्री मंगलानंद
मवाना। जैन तीर्थ हस्तिनापुर के श्री दिगम्बर जैन प्राचीन बड़ा मंदिर के भव्य स्वर्णमयी त्रिमूर्ति जिनालय में चल रहे 40 दिवसीय श्री शांतिनाथ महामंडल विधान में महाराज मंगलानंद श्रीजी ने प्रवचन में कहा कि हमारी भारतीय संस्कृति धर्म प्रधान है। यहां भोग को नहीं योग को, साधन को नहीं साधना को, दवा के साथ दुआ को, ज्ञान के साथ गुण को तथा तप के साथ चारित्र को महत्व दिया जाता है।
प्रतिदिन की भांति मुख्य वेदी में विराजमान त्रय तीर्थंकरों के जलाभिषेक के साथ विधान की शुरूआत की गई। इसके बाद सभी भक्तगण त्रिमूर्ति जिनालय पहुंचे। वहां पर सभी श्रद्धालुओं ने विधान की मांगलिक क्रियाओं में दिग्बंधन, पात्र शुद्धि, जल शुद्धि, सकलीकरण की क्रियाएं की। शांतिधारा करने का सौभाग्य अभय जैन को प्राप्त हुआ।
मुनिश्री मंगलानंद महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि चारित्र की सर्वत्र पूजा होती है। आचरण से हीन ज्ञान बोझ के समान है। कोई व्यक्ति कितना ही ज्ञानी क्यों न हो जब तक उसका आचरण ठीक नहीं है। तब तक उसकी और उसके ज्ञान की महत्ता नहीं है। वह पूज्य नहीं है ज्ञान थोड़ा हो किन्तु आचरण से ठीक हो तो वह सज्जन पुरुष लोक में पूज्य एवं प्रभावशाली बन जाता है। इस अनुष्ठान में ब्रह्मचारिणी सुनीता दीदी के दिशा निर्देशन में विधान की मांगलिक क्रियाएं युवा विद्वान आशीष जैन शास्त्री ने विधिपूर्वक कराई। 40 दिवसीय शांतिनाथ विधान के 6वें दिन 110 परिवारों ने शिरकत कर धर्मलाभ उठाया।