लावड़-लावड़ में पायदान की बुनाई करते हुनरमंद।
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कंबल उद्योग के बाद लावड़ कस्बे की पहचान बना पायदान उद्योग भी मंदी की मार झेलने को मजबूर है। जिसके चलते इस उद्योग से किनारा कर कई परिवार बाहर नौकरी करने चले गए हैं। लावड़ कस्बे का कंबल उद्योग पूरे भारत वर्ष में मशहूर था। यहां के हरिद्वारी कंबल को खादी ग्राम उद्योग खरीदता था। यह कंबल देश की सरहद पर तैनात जवानों एवं जेल में कैदियों के लिए भेजा जाता था। विदेशों से हल्के एवं मखमली कंबल आ जाने के बाद खादी ग्राम उद्योग ने इस कंबल को खरीदना बंद कर दिया। जिस कारण मोमीन अंसार बिरादरी के परिवारों को खाने के लाले पड़ गए थे।
कंबल के बाद पायदान उद्योग ने बनाई जगह
हरिद्वारी कंबल उद्योग बंद होने के बाद यहां के हुनरमंदों ने पायदान उद्योग को रोजी-रोटी का साधन बनाया। पानीपत से आने वाले कच्चे माल को तैयार कर इस बिरादरी के सैकड़ों लोग अपने परिवार का भरण पोषण करने लगे। इस कारोबार से पुरुष से लेकर महिलाएं भी जुड़ीं। जिससे देखते ही देखते इस उद्योग ने कस्बे को नई पहचान दी।