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50 साल पहले सड़क पर ही बनाई थीं 175 दुकानें, कागजों ने दी गवाही

Mon, 27 May 2019 04:14 AM IST
Gaurav sharma न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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मेरठ - फोटो : अमर उजाला
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मेरठ। शहर का भीड़ भरा क्षेत्र भगत सिंह मार्केट एक नए विवाद में फंसता नजर आ रहा है। यहां पांच दशक पहले नगर निगम ने 175 दुकानों का निर्माण कराया था। लेकिन जहां कराया, वह जमीन सरकारी होने के साथ जमीन के बीचों बीच चौड़ी सड़क भी थी। राजस्व अभिलेख जहां सड़क पर दुकानों का निर्माण होने की गवाही दे रहे हैं, तो निगम सरकारी जमीन पर ही दुकानें निर्माण करने की बात स्वीकार कर रहा है। लेकिन इन दुकानों को लेकर उठे कई सवालों के बीच निगम फंसता नजर आ रहा है।
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r राजस्व रिकॉर्ड खंगाला तो खुला खेल
इस मार्केट की बढ़ती परेशानी पर जब आरटीआई एक्टिविस्ट मौ. अजहर और सचिन सैनी ने राजस्व विभाग से यहां की जमीनों की खसरा खतौनी मांगी तो पता चला कि जमीन सरकारी है और आज भी प्रशासन का नाम दर्ज है। सजरे में जमीन के बीचोंबीच बड़ा रास्ता भी दर्ज मिला। लेकिन निगम ने आरटीआई में कई बार की मांग के बावजूद जवाब नहीं दिया। बाद में जिलाधिकारी के निर्देश पर नगरायुक्त ने चार माह पूर्व अपना जवाब दिया। जिसमें उन्होंने नजूल की जमीन होना स्वीकार किया। कहा कि यह जमीन निगम के प्रबंधन में है। निगम ने बोर्ड में पारित प्रस्ताव के आधार पर यहां दुकानाें का निर्माण कराया। लेकिन सड़क पर निर्माण होने की बात को पूरी तरह से नकार दिया। नगरायुक्त ने भीड़ और जाम पर तर्क दिया कि जिस वक्त 1961 में दुकानें बनी थीं, उस वक्त शहर की आबादी करीब दो लाख थी, जो अब 16 लाख से ज्यादा हो चुकी है। लेकिन नगरायुक्त अपने जवाब के साथ सदन में पारित प्रस्ताव की प्रति नहीं दे सके। वहीं, नगरायुक्त यह भी जवाब नहीं दे पाए कि यदि निगम ने दुकानें बनाईं और वह किराया वसूल रहा है, तो           राजस्व अभिलेखों में उसने मालिकाना हक पर अपना नाम दर्ज क्यों नहीं कराया। ऐसे में निगम अवैध किराया वसूल रहा है।
r प्रशासन है मौन
इस पूरे प्रकरण पर प्रशासन मौन है। न तो निगम से स्थिति स्पष्ट करने को कहा और न ही आरटीआई के तहत मांग गए जवाबों पर स्पष्ट जवाब दिया। जबकि इस अनियोजित निर्माण से यह पूरा इलाका जाम रहता है। वहीं कोई भी आग की घटना यहां बड़ी अनहोनी करा सकती है।
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ये है पूरा प्रकरण

हापुड़ अड्डा चौराहा के पास भगत सिंह मार्केट है। यह मार्केट खसरा नंबर 4565, 4566 और 4567 में है। यह तीनों खसरा नंबर नजूल भूमि के हैं। भारत पाकिस्तान बंटवारे के बाद शरणार्थी हिंदुओं के लिए यहां खोखे लगाकर उन्हें व्यापार करने की छूट दी गई थी। जिसका प्रबंधन स्थानीय निकाय को दिया गया था। साल 1961 में नगर पालिका ने यहां 175 दुकानें बनाकर किराये पर दे दीं। शरणार्थियों ने यहां खोखे सरकारी जमीन के बीच से निकल रही चौड़ी सड़क के दोनों तरफ आमने-सामने लगाए थे। लेकिन पालिका ने यहां के अलावा चौड़े मार्ग के बीचोंबीच भी दुकानें बना दीं और सड़क को दो भागों में बांटकर बहुत ही संकीर्ण कर दिया। नगर पालिका भी अब नगर निगम बन गई है। आज स्थिति ये है कि इस सघन बाजार में भारी भीड़ रहती है और आने वालों के लिए पार्किंग की भी व्यवस्था नहीं है। जिस कारण हापुड़ अड्डा चौराहा के मुख्य मार्ग पर सुबह से रात तक जाम की स्थिति बनी रहती है। रही सही कसर इस मार्केट के भीतर खड़े होने वाले ठेले वालों और सब्जी की फड़ लगाने वालों ने पूरी कर दी है।
किरायेदारी में भी खेल

निगम ने इन दुकानों को 70 के दशक में 3 रुपये प्रतिमाह की दर पर किराये पर दिया था। जिसका किराया आज बढ़कर 250 रुपये तक हुआ है। इसके पीछे बड़ा खेल है। जिन लोगों ने दुकान किराये पर ली थी, वह लाखों रुपये में किरायेदारी दूसरे को देकर जा चुके हैं। निगम में भी साठगांठ के खेल में किरायेदारी नये किरायेदार के नाम चढ़ा दी जाती है। जिससे निगम कर्मचारी अधिकारी अपनी जेब तो भर रहे हैं, लेकिन निगम के खजाने को भारी चोट पहुंचा रहे हैं। जबकि नियमानुसार पुराना किरायेदार अपनी किरायेदारी समाप्त कर निगम को दुकान हैंडओवर करेगा और उसके बाद निगम अपने स्तर से दुकान किराये पर देगा। यदि निगम इस तरीके को अपनाता है तो वर्तमान दर के अनुसार वह एक दुकान का 25 हजार रुपये महीना तक किराया वसूल सकता है।

मामला जाएगा हाईकोर्ट

आरटीआई एक्टिविस्ट सचिन सैनी का कहना है कि उन्होंने इस मामले में तमाम जरूरी साक्ष्य जुटा लिए हैं। जिसके आधार पर वह जनहित याचिका दायर करेंगे। क्योंकि निगम ने जहां अवैध निर्माण किया, तो अवैध रूप से किरायेदारी भी वसूल रहा है।

दुकानों को फ्री होल्ड कराना था
यह सही है कि जमीन नजूल की है। दुकानें बनने के बाद इसे फ्री होल्ड कराना था। लेकिन कुछ कारणों से नहीं हो पाया। किराये संबंधी मामले पर जवाब किराया विभाग के प्रभारी ही दे सकते हैं।                        
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                 -राजेश कुमार, संपत्ति  अधिकारी नगर निगम

 
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