रहमतों और बरकतों का महीना है रमजान
फलावदा। रमजान का महीना यानी रहमतों और बरकतों का महीना। इस माह में रहमत और बरकतें हर उस मोमिन पर उतार दी जाती हैं। जो अल्लाह के हुक्म को पूरा करते हुए रोजा रखे और इबादत भी करें। ऐसा करने वालों को अल्लाह ताला खुद अपने हाथों से इनाम से नवाजता है और कहता ताकि तुम ईमान और तकवे वाले बनो। इसी महीने में कुरआन शरीफ को हजरत मोहम्मद पर मुकम्मल उतारा गया। रमजान के दूसरे जुमे को नमाज अदा कर पूरे आलम के लिए दुआ मांगी।
रोजा रखने से मुराद प्यासे रहने से नहीं है और न ही ऐसे काम अल्लाह को पसंद है जो इंसान रोजे के दौरान झूठी बात कहने और झूठ पर अमल करने तथा बुराई से बचें। अल्लाह ताला को उसकी इबादत भूखा प्यासा रहना कोई अहमियत नहीं रखती। इंसान को चाहिए उन सभी लायानी बातों से दूर रहें। इस महीने में अल्लाह ने दुनिया में भटके लोगों को रास्ता दिखाने के लिए अपनी आखिरी आसमानी किताब यानी कुरान ए पाक को हजरत मोहम्मद पर उतारा। इसी महीने में हजरत मोहम्मद को भटके इंसानों को रास्ता दिखाने के लिए आखिरी पैगम्बर बनाकर दुनिया में भेजा। रमजान का महीना भलाई बरकत रहमत के अतिरिक्त दुआएं कुबूल होने का महीना है। अल्लाह ताला ने इंसानों को एक ऐसा महीना रमजान दिया है पूर्व में की गई गुनाह से तौबा कर लेने से सारी गुनाह माफ कर दी जाती है। वह मोमिन खुशकिस्मत माना गया है जो कि साफ मन से जिंदगी गुजारे। इस महीने को हासिल करें इस माह की पहली रात को ही जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं और दोजख के दरवाजे महीने भर के लिए बंद कर दिए जाते हैं। इसी तरह शैतान को भी कैद कर दिया जाता है। इस माह में नेकी और इबादत का सवाब 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। खुदा फरमाता है रोजा रखने के बाद यह एहसास होना भी जरूरी है। जिन लोगों को भर पेट खाना नहीं है उन लोगों के बारे में भी सोचा जाए। रोजा रखने के बाद खैरात जकात की भी खास अहमियत है। इस माह को तीन हिस्सों में बांटा गया है। पहले दस दिन का एक अशरा होता है। पहला अशरे में आसमान से रहमत, बरकते नाजिल होती हैं। दूसरा अशरा बख्शीश का और तीसरा अशरा दोजख की आग से निजात हासिल करने का है। रमजान के दूसरे जुमे को अकीदतमंदों ने नमाज अदा कर रहमत बख्शीश और पूरे आलम में अमनो अमान की दुआ मांगी।