धमाके बाद फैली दहशत, मची भगदड़ और अफरातफरी
बेहट (सहारनपुर)। गनीमत रही कि गोला डेरे से थोड़ी दूर गिरा, यदि गोला डेरों के ऊपर गिरता, तो कई की जानें जा सकती थीं। विस्फोट के बाद वन गुर्जर नूर अहमद की बेटी नेक बीवी और सुल्तान की बेटी नूरजहां सदमे में है और बेहोशी की हालत में है। विस्फोट के समय वन गुर्जरों के डेरों पर पोलियो ड्राप्स पिला रहे वन रक्षक ब्रजपाल सिंह और वाचर उदय सिंह ने बताया कि एक बारगी तो उन्हें समझ ही नहीं आया, कि हुआ क्या, फायरिंग अभ्यास के दौरान गोला आ जाने का अनुमान लगाते ही जान बचाने के लिए दौड़ पड़े।
दोपहर दो बजे करीब चपड़ी खोल में रहने वाले नूर अहमद, सुल्तान, तालिब और नूर मोहम्मद आदि वन गुर्जरों के डेरे के पास यह तोप का एक गोला गिरा था। इस हादसे में वन गुर्जर सैमुलक की पत्नी फातिमा (32) की मौके पर ही मौत हो गई। फातिमा सात महीने की गर्भवती थी, जबकि डेरों पर पोलियो ड्राप्स पिलाने के लिए गई वन विभाग की टीम में शामिल वाचर अब्दुल गनी और वन गुर्जर इमाम हुसैन (30) पुत्र सुल्तान घायल हो गए। विस्फोट में नूर मोहम्मद की चार भैंसें और दो बकरी भी घायल हुई हैं। उधर, हादसे की सूचना पर सीओ बेहट शिवराज सिंह और मिर्जापुर थाना पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने मृतक महिला के शव का पंचानामा भरा। हालांकि परिजनों ने पोस्टमार्टम कराने से इंकार कर दिया। इस पर पुलिस ने पोस्टमार्टम की कार्रवाई नहीं की।
डेढ़ दशक बाद पहले भी हुआ इसी तरह का हादसा
कई लोग गवां चुके हैं फ ायरिंग रेंज में मिलने वाले गोलों के फटने से
बेहट।
आरक्षित वन क्षेत्र में अधिकतर हादसे सेना के फायरिंग अभ्यास के बाद मिस हुए गोलों से धातु निकालने के लालच में हुए हैं। कितने ही लोग जरा से लालच में मौत के मुंह में समा चुके हैं, लेकिन बृहस्पतिवार को हुआ हादसा 15 साल में दूसरी बार हुआ है। जब सेना की तोप से निकला गोला सीधे वन गुर्जरों के डेरों के बाहर गिरा।
चपड़ी खोल में जिस जगह वन गुर्जरों के डेरों के बाहर तोप का गोला गिरा वह जगह फायरिंग स्थल से करीब छह-सात किमी दूर है। 15 साल पहले जब यह घटना हुई थी तब दर्जनों मवेशियों की मौत हो गई थी। इस घटना में घायल वन गुर्जर इमाम हुसैन, नूर मोहम्मद, नूर अहमद, सुल्तान और तालिब ने बताया कि सुबह से तीन चार गोले उनकी खोल में जंगल में गिर चुके हैं। उन्होंने बताया कि उनके परिवार पिछले करीब 100 साल से रह रहे हैं। सेना फायरिंग अभ्यास के दौरान लगातार इस तरह के हादसे का खतरा बना रहता है, जिस संबंध में उन्होंने पुलिस एवं वन विभाग के अधिकारियों को लिखित प्रार्थना पत्र भी दिए है, जिनके माध्यम से वह मांग कर चुके हैं, कि सेना फायरिंग अभ्यास के लिए एक दायरा निश्चित कर दिया जाए, ताकि वह उसकी जद से बाहर अपने ठिकाने बना सकें।
आरक्षित वन क्षेत्र में हुए हादसे
2 जनवरी 2001- थाना मिर्जापुर के गांव नौगांवा में मिस गोले से धातु निकालने के दौरान वह फट गया था और घटना में तीन ग्रामीणों के चीथड़े उड़ गए थे।
20 फरवरी 2002-जंगल से मिला निष्क्रिय बम फटने से मिर्जापुर में वाजिद, मुख्तियार, नफीस, रेशणान की मौत होगई थी। शफाकत, इनाम, अंजुम व नफीसा भी चपेट में आकर घायल हो गए थे।
28 फरवरी 2002-मिर्जापुर थाने के ही गांव शेरपुर पेलो में हुए बम धमाके में सुवराज, सोनू, अमर सिंह व विक्की की मौत हो गई थी।
15 दिसम्बर 2002- शेरपुर पेलो के ही अब्दुल कादिर व उसके बेटे अब्दुलहक की भी इसी तरह से मौत हो गई थी। संजीदा व उसकी पुत्री शायरा घायल।
2004-कोठड़ी बहलोलपुर निवासी प्रमोद की बम फटने से मौत व मिर्जापुर निवासी रियाज, नौशाद व हरध्यान घायल होगे थे।
19 अक्टूबर 2005-शेरपुर पेलो के ही रणधावा के अलावा तीन लोगों के चीथड़े उड़ गए थे।18 नवंबर 2007 मेंशेरपुर पेलो निवासी गालिब भी बम विस्फोट में मारा गया।
13 मई 2008-शेरपुर पेलो की जानिमा पत्नी ईरशाद व उसके एक वर्षीय बच्चे मुबारिक, 6 वर्षीय दिलरूबा पुत्री इस्लाम की मौत हो गई थी।
14 मार्च 2010-गंाव मिर्जापुर निवासी रियासत पुत्र नूर मोहम्मद, जावेद पुत्र साजिद व सादिक पुत्र इनाम की बम फटने से मौत हो गई थी।25 दिसंबर 2012 में रजापुर नौगांवा निवासी राशिद की बम फटने मौत।
वर्ष 2013 में शेरपुर पेलो निवासी आतिफ पुत्र मकसूद की बम फटने जंगल में मौत हो गई थी। दिलशाद गंभीर रूप से घायल हुआ था। 20 जनवरी 2015 को शाकंभरी रेंज की कोठड़ी तुलसी निवासी सन्नी पुत्र सुल्तान, मन्नी व हरदीप घायल
6 जनवरी 2017 को कोठड़ी खोल में कोठड़ी चेतराम निवासी चमन सिंह के बेटे सोनू व निखिल की बम फट जाने से मौत हो गई थी।