बौंद्रा। अमीरउल्ला शाह औलिया पीर ने अपनी छोटी सी जिदंगी मे गरीबों और बेसहारा लोगों को खिदमत में गुजार दी। वहीं, अमीरउल्ला शाह अपने पिता के हुक्म पर 18 साल की उम्र में दुनिया से पर्दा कर गए थे। उनके जीवन के सिद्धांत ने समाज में दूसरे के काम आने की शिक्षा दी। इसकी याद में हर वर्ष ललियाना में उनकी मजार पर तीन दिवसीय उर्स का आयोजन किया जाता है।
उर्स के संरक्षक वसीम फरीदी ने बताया कि अमीरउल्ला शाह बचपन से ही गरीब और बेसहारा लोगों से लगाव रखते थे। उसकी कुदरत की तरफ से ही ऊंचा रुतबा मिला था। बताया जाता है कि एक बार अमीरउल्ला शाह को बंजारों का काफिला जाता हुआ दिखाई दिया। उन्होंने काफिले में शामिल लोगों से पूछा कि इन बोरों में क्या है। बंजारों ने यह सोचकर कि खांड बताने पर यह मांगेगा इसलिए उन्होंने नमक बता दिया। इतना सुनकर अमीरउल्ला शाह ने कहा कि चलो नमक ही होगा। कुछ दूर आगे जाने पर जब बंजारों ने खाना खाते वक्त खांड निकालनी चाही तो उसमें नमक मिला। यह देख बंजारों को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने गांव ललियाना में आकर अमीरउल्ला शाह के वालिद नशरूल्ला शाह से घटना के बारे में बताया। इस पर नशरूल्ला शाह ने अमीरउल्ला शाह को बुलाकर कहा कि ऐसा नहीं करते हैं। इन्हें वैसा ही कर दो बाद में बंजारों ने जाकर देखा तो बोरों मे खांड भरी मिली। इस तरह की कई घटना होने के बाद नशरूल्ला शाह ने सोचा कि इस तरह लोग रोज परेशान होते रहेंगे। ऐसा सोचकर नशरूल्ला शाह ने अमीररूल्ला शाह से लगभग 18 वर्ष कि आयु में कहा कि अब तुम पर्दा कर जाओ। इसके कुछ समय बाद ही अमीरउल्ला शाह दुनिया से इंतकाल फरमा गए और ललियाना जामा मस्जिद के बराबर में दफनाकर उनका मजार बना दिया गया। तभी से उनके मजार पर हर वर्ष मुहर्रम के तेरह तारीख से तीन दिवसीय उर्स आयोजित किए जाने लगा । वहीं, बताया जाता है कि अपनी छोटी सी जिंदगी अमीरउल्ला शाह ने गरीब और यतीम की खिदमत करने में गुजार दी। उनके संदेश से आज भी लोग दूरदराज के गांव से आकर मजार पर चादर चढ़ाते हैं और मन्नतें मांगते हैं। बताया कि अमीरउल्ला शाह की मजार के अतिरिक्त जूड़ के जंगल में उनके वालिद नशरूउल्ला शाह के माजर की भी देखभाल करते हैं। तीन दिवसीय मेले में दिल्ली, जयपुर, मेरठ, अजमेर, हापुड आदि जिलों से हजारों कि संख्या में तीन दिन रोजाना लोग मजार पर फतिया पढ़ते हैं।
मुख्य बातें
अमीरउल्ला शाह औलिया के पीर पर 24 से 27 तक उर्स
दूर दराज से हजारों की संख्या में फातिया पढ़ने पहुंचते हैं लोग