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विराग सागर महाराज ससंघ दिगंबर जैन मंदिर पहुंचे।

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हस्तिनापुर।
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जैन धर्म के तीन तीर्थंकरों भगवान शांतिनाथ, कुंथूनाथ एवं अरहनाथ जन्म च्यवन दीक्षा, दीक्षा एवं केवल ज्ञान तथा 12 कल्याणकों की पवित्र भूमि पर रविवार प्रात: श्री दिगंबर जैन मंदिर पर आचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज श्री विहर्ष सागर जी महाराज, माता श्री 108 विशिष्ठ श्रमणी आर्यिका विवोध, श्री माता जी की विशाल संघ के साथ प्रात: दस बजे पहुंचे। यहां पुष्प वर्षा के साथ उनका भव्य स्वागत किया।
महाराज श्री की मंडली का प्रात: हस्तिनापुर कस्बे के मुख्य द्वार पहुंचने पर जैन श्रद्धालुओं ने उनका भव्य स्वागत किया एवं विशाल यात्रा के साथ मंदिर पहुंचे। महाराज श्री ने श्रद्धालुओं को बताया कि जैन पौराणिक परंपरा के अनुसार अयोध्या एवं हस्तिनापुर की रचना देवताआें द्वारा की गई थी। हस्तिनापुर वही स्थान है जहां भगवान आदिनाथ को प्रथम आहार मिला था। करोड़ों वर्ष पूर्व यहां पर इन तीनों तीर्थंकरों के चार-चार कल्याणक हुए थे। इन तीनों महापुरुषों ने हस्तिनापुर को राजधानी बनाकर यहां से छह खंड का राज्य संचालित किया था। आज से लगभग छियासी हजार पांच सौ वर्ष पूर्व महाभारतकाल में भी हस्तिनापुर नगरी भारत की राजधानी मानी जाती थी। श्री दिगंबर जैन मंदिर पर तीर्थ क्षेत्र कमेटी के महामंत्री मुकेश जैन सर्राफ समेत सैकड़ों श्रद्धालुओं ने गुरुवर की आरती एवं पाद प्रक्षालन किया। इतने बडे़ संघ के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ एकत्रित हुई। उत्तर प्रांतीय गुरुकुल के बच्चों ने भव्य यात्रा में धार्मिक जयकारों के साथ चल रहे थे। जिसमें कह रहे थे कि मुनि को देख लो त्याग करना सीख लो। महावीर स्वामी का संदेश जियो और जीने दो की भावना के साथ जयकारे लगाकर धर्म प्रभावना कर रहे थे। महाराज मंडली संघ के संतों एवं साध्वियों ने श्री दिगंबर जैन मंदिर के समीप कैलाश पर्वत नंदीश्वर द्वीप जिनालय, कैलाश पर्वत समेत सभी मंदिरों में पंहुचकर भगवंतों के दर्शन किए।
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मंदिरों के दर्शन किए
हस्तिनापुर।
आचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज के संघ को श्रद्धालु जंबूद्वीप लेकर पहुंचे। यहां उन्होंने सुमेरू पर्वत, कमल मंदिर, ध्यान मंदिर, भगवान आदिनाथ जिनालय, सर्वतोभद्र महल, ऋषभदेव कीर्ति स्तंभ, दीक्षा कल्याणक तपोवन समेत सभी मंदिरों के दर्शन किए और धर्मसभा में कहा कि जंबूद्वीप के जिनमंदिरों देवभवनों के जिनालयों व समवसरणमंदिरों के धार्मिक वातावरण में श्रद्धालुओं को पूजा अर्चना कर धर्मलाभ अर्जित करना चाहिए। यह जैन धर्म की ऐतिहासिक पुरातन नगरी है। यहां जैन धर्म के तीर्थकराें के कल्याणक होने का सौभाग्य भी इस नगरी को प्राप्त हुआ है। उत्तर भारत के गौरव का प्रतीक माने जाने वाला जम्बूद्वीप रचनाअ पने आप में स्वयं एक परिपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र है जिसके दर्शन के द्वारा समस्त श्रद्धालुओं को शांति एवं धार्मिकता का अनुभव एवं भाव उत्पन्न होता है। पीठाधीश स्वस्ति स्वामी रवीन्द्र कीर्ति ने कहा कि इस जम्बूद्वीप परिसर में प्रत्येक आगन्तुक को आध्यात्मिका एवं ध्यानसाधना का संदेश मिलता है। उन्होंने बताया कि सन 1972 में गणिनी प्रमुख आर्यिका श्रमणी श्री ज्ञानमती माता जी की प्रेरणा से स्थापित संस्था द्वारा जम्बूद्वीप रचना के निर्माण 1974 में भूमि क्रय कर किया था। वर्तमान में श्री ज्ञानमती माता जी मांगी तुंगी में ससंघ विराजमान है। वहां उनके मंगल आशीर्वाद से भव्य जैन मंदिरों का निर्माण किया जा रहा है। जैन भूगोल का ज्ञान कराने वाली जम्बूद्वीप रचना हमारी विशाल सृष्टि की प्रतिकृति है। कार्यक्रम में विहर्स सागर, विहित सागर, विवर्धन सागर महाराज एवं श्रमणी आर्यिका विवोधश्री माता जी, वियुक्त जी, विश्वास श्री माता जी, विवक्षा श्री माता जी भी संघ में रहे। संस्थान के प्रबंध मंत्री विजय जैन सुभाष चंद, गुरूसागर महाराज, नरेश बंसल दिल्ली, संजय जैन मनोज राजीव जैन आदि शामिल रहे।
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