मेरठ। ऐसे वीर सपूत कम ही पैदा होते हैं, जो देश की खातिर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। ऐसे ही वीर सपूत थे मेरठ के मेजर मनोज तलवार। बचपन में जिस उम्र के बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, उस उम्र में मनोज तलवार पिता की वर्दी की कैप लगाकर साथियों के साथ फौज की जंग का अभ्यास करते थे।
सेना के प्रति उनका जुनून और जज्बा इस कदर था कि मां और बहन ने जब छुट्टी खत्म होने से पहले घर बसाने की बात की तो वे ये कहकर चले गए कि सेहरा नहीं बांध सकता मां ...मेरा तो समर्पण देश के साथ जुड़ चुका है। शायद उनको आभास हो गया था कि देश के लिए कुछ कर गुजरने का वक्त आ गया है। 13 जून को कारगिल में दुश्मनों को ढेर करने के बाद टुरटक की पहाड़ियों पर तिरंगा लहराने के बाद वे शहीद हो गए। मरणोपरांत उनको वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
मूल रूप से पंजाब के जालंधर और अब मवाना रोड डिफेंस कालोनी निवासी सेना में कैप्टन पीएल तलवार के सुपुत्र मनोज तलवार का जन्म 29 अगस्त 1969 को मुजफ्फरनगर की गांधी कॉलोनी में हुआ था। जब मनोज दस साल के थे तो पिता की पोस्टिंग कानपुर में थी। घर के पास प्लॉट में तारबंदी थी। वहां से सेना के जवान परेड के लिए जाते थे। मनोज तारबंदी कूदकर जवानों से हैलो बोलकर आते थे। पिता की ड्रेस पहनकर अपने दोस्तों के साथ जवानों की तरह जंग करने के सीन बनाते थे। जवानों को देखकर यही कहते कि मैं बड़ा होकर सेना में जाऊंगा। वे एनडीए में सेलेक्ट हो गए। वर्ष 1992 में कमीशन प्राप्त कर महार रेजीमेंट में लेफ्टीनेंट पद पर नियुक्त हुए। प्रथम तैनाती जम्मू कश्मीर में हुई। कमांडो की विशेष ट्रेनिंग के बाद उन्हें असम में उल्फा उग्रवादियों का सफाया करने के लिए भेजा गया। फरवरी 1999 में मेजर मनोज तलवार की रेजीमेंट फिरोजपुर पंजाब में तैनात हुई। लेकिन कुछ कर गुजरने की चाह रखने वाले मेजर मनोज तलवार ने सियाचिन में नियुक्ति की मांग कर दी।
मैं किसी लड़की का जीवन बर्बाद नहीं कर सकता
पिता पीएल तलवार बताते हैं कि सियाचिन जाने से पहले वे मार्च में मेरठ घर आए। छुट्टी खत्म होने से कुछ दिन पहले माता-पिता, भाई व बहन ने उनसे शादी करने की बात कही। इस पर उन्होंने कहा कि मां मेरा समर्पण तो देश के साथ जुड़ चुका है। मैं उसकी हिफाजत पर कुर्बान होने के लिए हर पल तैयार रहता हूं। अभी तो उसकी हिफाजत के लिए वचनबद्ध हूं। पता नहीं क्या हो। मैं किसी लड़की का जीवन बर्बाद नहीं करूंगा। इसके बाद वे चले गए। इसी बीच कारगिल में लड़ाई छिड़ गई। उनको कारगिल में भेजा गया।
...वो आखिरी चिट्ठी
12 जून 1999 को उन्होंने आखिरी चिट्ठी लिखी। कैप्टन पीएल तलवार बताते हैं कि मनोज क्रिकेट का बहुत शौकीन था। उसने लिखा कि भारत की पाकिस्तान पर क्रिकेट में जीत का जश्न हमने दुश्मनों पर गोले बरसाकर मनाया है। चिंता मत करना। मैं युद्ध में अपना फर्ज निभा रहा हूं। ये चिट्ठी पोस्ट करने के बाद मेजर मनोज तलवार कारगिल में टुरटक सेंटर की शून्य से 60 डिग्री नीचे तापमान की 19 हजार फीट ऊंची खड़ी चोटी पर घुसपैठियों को भगाने के लिए अपनी टुकड़ी लेकर बढ़ चले। 13 जून 1999 की शाम दुश्मनों को मारकर ऊंची चोटी पर तिरंगा फहरा दिया। लेकिन इसी बीच दुश्मनों की तोप के गोले से वे शहीद हो गए।
चिट्ठी के साथ पहुंचा पार्थिव शरीर
कैप्टन पीएल तलवार बताते हैं कि 14 जून 1999 की दोपहर जैसे ही दिल्ली दूरदर्शन से समाचार प्रसारित हुआ तो वह बेचैन हो उठे। बेटे की शहादत का पता चला तो आवाज नहीं निकली। वह बताते हैं कि वह पल आज भी आंखों के सामने है। 16 जून की सुबह मनोज तलवार का पार्थिव शरीर मेरठ लाया गया। उसकी लिखी चिट्ठी भी उसी दिन पहुंची। मां ऊषा तलवार का बुरा हाल हो गया। 12 दिसंबर 2016 को उनको देहांत हो गया। पीएल तलवार बताते हैं कि अंतिम समय तक वो मनोज को याद करती रहीं।
प्रशासन ने की अनदेखी
पीएल तलवार बताते हैं कि प्रशासन ने कमिश्नर आवास चौराहे के रखरखाव के समय मेजर मनोज तलवार की प्रतिमा को बीच स्थान से हटाकर फुटपाथ पर लगा दिया। यह एक शहीद की अनदेखी रही। पत्थर पर शहादत की तिथि भी गलत लिखवा रखी है। उन्होंने अफसरों से गुहार भी लगाई। लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। वे कहते हैं कि शहीदों की इस तरह से उपेक्षा करेंगे तो कौन देश पर कुर्बान होगा। शहीद मनोज तलवार की दो बहनों की शादी हो चुकी है। छोटे भाई नवनीत तलवार पेट्रोल पंप का काम देखते हैं।
खास बातें:
कारगिल के अमर शहीदों को नमन
13 जून 1999 को कारगिल में तिरंगा लहराने के बाद शहीद हुए थे मेजर मनोज तलवार
सेना और देश के लिए कुछ कर गुजरने का कूट कूटकर भरा था उनमें जुनून और जज्बा