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यूनिवर्सिटी में समितियां तो बनी लेकिन हुआ कुछ नहीं

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समितियां बनीं, जांच हुई और कार्रवाई शून्य
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चौधरी चरण सिंह विवि में हुए घपलों में कई मामलों में नहीं हुई सख्त कार्रवाई
एमबीबीएस पेपर लीक मामला या कॉपियां बदलने का खेल, नहीं बढ़ रही जांच

मेरठ।
चौधरी चरण सिंह विवि में जब भी कोई घपला सामने आता है तो विवि प्रशासन समिति का गठन कर देता है। समिति महीनों जांच करती है, लेकिन अधिकतर मामलों में कार्रवाई शून्य ही नजर आती है। पिछले दो दशक की बात करें तो एकाध मामले को छोड़कर समिति की रिपोर्ट के बाद किसी पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई। ताजा मामला कॉपियों की अदला-बदली का है। इसमें अभी तक यूनिवर्सिटी की जांच एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई है। वहीं एमबीबीएस पेपर लीक प्रकरण में भी अभी तक किसी पर कार्रवाई नहीं हो पाई है।
सीसीएसयू में सन् 1995 के बाद कई प्रोफेशनल कोर्सेस की शुरूआत हुई। विवि से संबद्ध कालेजों की संख्या भी बढ़ने लगी। इसी के साथ विवि में घपलों का दौर शुरू हो गया। साल 2000 में पहली बार उत्तर पुस्तिकाओं में नंबरों की हेराफेरी का मामला सामने आया। इसके बाद कुलपति ने कुछ प्रोफेसर की जांच समिति बना दी। पूर्व छात्र नेताओं के मुताबिक कुछ दिन तक मामला सुर्खियों में रहा। इसके बाद सब कुछ दब गया। समिति के सदस्य भी शांति से बैठ गए। इसके बाद 2003 में बीएड कॉलेजों को गलत तरीकेसे मान्यता देने के आरोप लगे। इसको लेकर भी समिति बनी और मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
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जब दांव पर लगी विवि की साख
साल 2006 में विवि की साख दांव पर लग गई, जब यहां की उत्तर पुस्तिकाएं आगरा में कूड़े के ढेर में मिलीं। इन कॉपियों को आठवीं के बच्चों द्वारा जांचा जा रहा था। इस मामले में भी समितियां बनीं, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। हां, तत्कालीन कुलपति प्रो. एसपी ओझा के आदेशों की अवहेलना करने पर कॉपी मूल्यांकन घोटाले के मामले में प्रो. एपी गर्ग को पहली बार किसी समिति ने बर्खास्त किया। इस मामले में सवाल उठे थे कि पूरे प्रकरण में प्रो. एसपी ओझा का बड़ा रोल था। इसके बाद भी विवि प्रशासन और समितियों का रवैया ऐसा ही रहा।
पेपर लीक मामले में निष्कर्ष नहीं
सवा माह पहले हुए एमबीबीएस पेपर लीक मामले में भी विवि ने समिति का गठन कर दिया। गंभीर प्रकरण होने के बाद भी आज तक उसमें जांच किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई है। ताजा मामला उत्तर पुस्तिकाएं अदला-बदली का है। इस मामले में एसटीएफ ने एक छात्र और विवि के तीन कर्मचारियों को जेल भेजा है। दो कर्मचारी अभी फरार हैं। इसके बाद भी यूनिवर्सिटी अपनी तरफ से कोई जांच नहीं करा सकी है। अभी तक जांच समिति पर भी कोई निर्णय नहीं हो सका है।
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पुलिस की जांच भी नहीं बढ़ी
मामले में यूनिवर्सिटी तो अपने रवैये पर काम कर रही है। लेकिन पुलिस की जांच भी आगे नहीं बढ़ पाई है। अभी तक ये भी स्पष्ट नहीं हो सका है कि जो लिखी हुईं उत्तर पुस्तिकाएं एसटीएफ ने बरामद की हैं, वे खाली कॉपी एसडी कॉलेज से कैसे बाहर निकलीं। उन कॉपियों को एसडी कॉलेज में रिसीव भी किया गया था या नहीं। ऐसे में यूनिवर्सिटी के कर्मचारी और छात्र भी जांच पूरी होेने पर संदेह जता रहे हैं।
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