- पीवीवीएनएल को शहर में नहीं मिल पा रही सब स्टेशन निर्माण के लिए जमीन
- पुराने बिजलीघरों क्षमता वृद्धि की जा रही, आगे मांग बढ़ने पर नहीं हो सकेगा एक्सटेंशन
- 400 मीटर जमीन में ही स्थापित हो जाता है गैस इंसुलेटिड बिजलीघर
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ।
33 केवी बिजलीघरों के लिए जमीन की किल्लत से जूझ रहे पीवीवीएनएल ने गैस इंसुलेटिड सब स्टेशन निर्माण की ओर रुख करने का मन बनाया है। हालांकि इससे पहले भी शहर के इंदिरा चौक पर प्रदेश का पहला गैस इंसुलेटिड सब स्टेशन बनाने का प्लान शासन को भेजा गया था जो परवान नहीं चढ़ सका।
केंद्र सरकार की तरफ से चल रही आईपीडीएस योजना के तहत शहरों में और डीडीयूजीजेवाय के तहत गांवों में बिजली का ढांचा विकसित किया जाना है। साथ ही पुराने ढांचे को सुदृढ़ भी किया जाना है। दोनों योजनाओं में बनने वाले नए सब स्टेशनों के लिए विभाग गांवों में ग्राम पंचायत से और शहरों में नगर निगम या विकास प्राधिकरणों की जमीन की राह तकता है। दोनों योजनाओं में पश्चिमांचल के 14 जिलों के गांवों और शहरों में 200 से ज्यादा नए सब स्टेशन बनाए जाने हैं। इनमें से दर्जनों जगह अब भी ऐसी है जहां जमीन नहीं मिलने से बिजलीघर का काम शुरू नहीं हो सका है। जमीन की सबसे ज्यादा किल्लत शहरों में हो रही है। इससे पहले शहरों में ऊर्जीकृत सब स्टेशनों की जरूरत के मुताबिक क्षमता वृद्धि की जा चुकी है। अब इन पर इतनी जगह नहीं बची कि आने वाले समय में इन बिजलीघरों से नए कनेक्शन या लोड जारी किया जा सके। मेरठ शहर की बात करें तो यहां पर भी आधा दर्जन से ज्यादा बिजलीघर प्रस्तावित है, लेकिन जमीन नहीं मिलने से बनाए नहीं जा रहे हैं।
400 वर्ग गज जमीन में ही बन जाता है गैस इंसुलेटिड सब स्टेशन
33 केवी सामान्य बिजलीघर के निर्माण के लिए 1500 से 2000 वर्ग गज जमीन की जरूरत पड़ती है, जबकि गैस इंसुलेटिड बिजलीघर 400 वर्ग गज जमीन पर ही बन जाता है। जमीन की किल्लत के चलते अभी तक मुंबई जैसे शहरों में गैस इंसुलेटिड बिजलीघर बनाए गए हैं।
नाले पर भी मांगी जा रही जगह
शहर में बिजलीघर बनाने के लिए जमीन नहीं मिलने पर पावर कारपोरेशन ने नगर निगम के नालों के ऊपर बिजलीघर बनाने की अनुमति मांगी है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि शहर के बीच से निकल रहे नालों के ऊपर पिलर और लेंटर की मदद से बिजलीघर तैयार किया जा सकता है। विभाग ने इसका प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों के पास भेजा है। वहां से हरी झंडी मिलने के बाद नगर निगम में प्रस्ताव रखा जाएगा।
तीन गुणा महंगा, लेकिन सुरक्षित ज्यादा
गैस इंसुलेटिड बिजलीघर सामान्य बिजलीघर से करीब तीन गुणा महंगा है, लेकिन इससे कहीं ज्यादा सुरक्षित रहता है। पावर अधिकारियों के अनुसार 33 केवी (20 एमवीए) क्षमता के गैस इंसुलेटिड बिजलीघर निर्माण पर करीब 6 करोड़ रुपये का खर्च आता है। स्विच यार्ड में केवल ट्रांसफार्मर ही दिखाई देंगे, कैपेसेटर पैनल बैंक में (केबल इन और केबल आउट) कैनोपी में होंगे। गैस फिल्ड सिस्टम सामान्य बिजलीघर के सिस्टम से बेहद कम जगह घेरता है।
सामान्य बिजलीघर के मुकाबले ज्यादा फायदा
जमीन के अभाव में सामान्य बिजलीघर को जरूरत की जगह से दूर बना दिया जाता है। इसके बाद लंबी-लंबी लाइनों से क्षेत्र विशेष को बिजली आपूर्ति की जाती है। इस प्रक्रिया में लाइन लॉस तो होता ही है फाल्ट भी ज्यादा होते हैं। गैस इंसुलेटिड सब स्टेशन कम जमीन में बनने के चलते लोड सेंटर में ही स्थापित कर दिए जाते हैं। इसमें लाइनें छोटी होती है जिसमें लॉस कम होता है और फुल वोल्टेज मिलते हैं।
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क्या कहते हैं अधिकारी
गैस इंसुलेटिड बिजलीघर जमीन नहीं मिलने पर सामान्य बिजलीघर का विकल्प है। यह महंगा तो पड़ता है, लेकिन कारगर बहुत है। शहरों में खासकर आबादी के बीच बिजलीघरों के लिए जमीन मिलने में दिक्कत हो रही है। कम जमीन मिलने की स्थिति में गैस इंसुलेटिड बिजलीघर का विकल्प ही बचता है। फिलहाल जमीन की तलाश की जा रही है। नहीं मिलने की स्थिति में इसका प्रस्ताव भी भेजा जा सकता है। -अभिषेक प्रकाश, एमडी पीवीवीएनएल