फिरंगी हुकुमत में क्रांतिकारियों को जुल्म सहते हुए भी जारी रखा इंकलाब
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अमर उजाला ब्यूरो
सरूरपुर।
देश की आजादी की लड़ाई में रासना गांव का अहम योगदान रहा है। यहां के ग्रामीण सत्याग्रह एवं भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहे। रासना में 17 लोगों ने आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई। अंग्रेजों ने आंदोलन के दौरान लोगों पर जमकर लाठियां बरसाईं, लेकिन आजादी के दीवानों ने तमाम जुल्म सहने के बाद भी इंकलाब जारी रखा।
भारत छोड़ा आंदोलन के जरिए फिरंगी हुकूमत के खिलाफ बिगुल बजा दिया था। आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेज सरकार ने सैकड़ों लोगों पर जुल्म किए। रासना गांव से सागर सिंह, ओमप्रकाश, बसंत सिंह भृंग, फूल सिंह सेठ, मिट्ठन लाल, भिक्कन, काले, मुंशी, रतीराम, डालचंद, बाबू सूरत सिंह, महाशय रेवा सिंह, उमराव, मास्टर सुंदरलाल, जहारिया, प्रणाम सिंह त्यागी एवं मास्टर रघुवीर सिंह त्यागी ने स्वाधीनता संग्राम में अहम भूमिका निभाई। गांव रासना स्थित गांधी आश्रम (वर्तमान में रासना इंटर कॉलेज) उस समय क्रांतिकारियों का अड्डा बन गया था। वहां आजादी के सिपाहियों ने अंग्रेजों से बचने के लिए भूमिगत जगह बना ली थी। बुजुर्गों का कहना है कि इस स्थान पर अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति बनाने के लिए आचार्य कृपलानी, जमनालाल बजाज, भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों के पैर इस धरती पर पड़े थे।
स्वतंत्रता सेनानी की स्मृति में द्वार स्थापना
मेरठ-बड़ौत मार्ग स्थित रासना मोड़ पर स्वतंत्रता सेनानी ने ग्रामीणों और श्री शालिगराम शर्मा स्मारक परिन्यास ट्रस्ट के सहयोग से सेनानी स्वर्ण जयंती द्वार की स्थापना कराई। जिस पर मेरठ जनपद के समस्त स्वतंत्रता सेनानियों के नाम अंकित हैं।