15 करोड़ से ज्यादा की छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति फर्जी ढंग से हड़पने की पटकथा आखिर बिना समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों के कैसे लिखी गई, यह बड़ा सवाल है। यदि प्रशासनिक टीम जांच नहीं करती तो यह भुगतान हो जाता, तो तब इसका जिम्मेदार कौन होता? इसका जवाब किसी अधिकारी के पास नहीं है। हां, अब चोरी पकड़े जाने पर वे एक-दूसरे को कसूरवार जरूर ठहरा रहे हैं।
जिले में 15 कॉलेज ऐसे मिले हैं, जहां शुल्क प्रतिपूर्ति एवं छात्रवृत्ति के नाम पर बड़ा खेल खेलने की तैयारी थी। छात्र थे ही नहीं और फर्जी ढंग से पूरा खाका खींच दिया गया। समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों के रहते हुए कैसे फर्जी छात्रों के रजिस्ट्रेशन हो गए और विभाग ने हरी झंडी दे दी। डीएम के आदेश पर एडीएम, एसडीएम, एसीएम, ज्वाइंट मजिस्ट्रेट तथा अन्य जिला स्तरीय अधिकारियों ने कुल 34 कॉलेजों में जांच की थी। इनमें से कई में भारी अनियमितता मिली। 15 कॉलेजों पर न केवल मुकदमा दर्ज हुआ है बल्कि सभी ब्लैक लिस्ट होंगे।
वर्तमान अफसरों ने की गड़बड़ी
डीएम के निर्देश पर ही शुद्ध डाटा शासन को भेजा गया था। पता नहीं वर्तमान अधिकारियों ने क्या किया है, जो यह सब हुआ है।
- मोहम्मद मुश्ताक, पूर्व जिला समाज कल्याण अधिकारी
एक-दूसरे को बता रहे दोषी
जिला समाज कल्याण अधिकारी उमेश द्विवेदी के मुताबिक डीएमके माध्यम से पत्र शासन को भेजा गया है। उल्लेख यह भी किया गया है कि पूर्व में यहां रहे समाज कल्याण अधिकारी मोहम्मद मुश्ताक ने डीएम द्वारा गठित समिति के अनुमोदन के बिना ही इन कॉलेजों का डाटा शासन को भेज दिया। यह भारी गड़बड़ी हुई है। उधर, मो. मुश्ताक कहते हैं कि कमेटी ने जांच की थी। कुल 23 हजार छात्रों का शुद्ध डाटा प्राप्त हुआ, जिसमें से अभी केवल 13 हजार का डाटा ही शासन को भेजा गया था। समिति की दो बैठक हुई थी। तीसरी बैठक अंत में होती है। उन्होंने कहा कि पता नहीं वर्तमान अधिकारियों ने क्या कि या कि इस तरह का गड़बड़झाला हो गया। वर्तमान में मुश्ताक सहारनपुर में तैनात हैं।
सभी अफसरों के साइन भी नहीं थे
शुल्क प्रतिपूर्ति तथा छात्रवृत्ति के लिए गठित समिति की बैठक के बाद रिपोर्ट तैयार हुई थी। लेकिन इस पर अधिकारी भी एकमत नहीं हुए थे। तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी और पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारी ने इस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कर दिए थे। उधर, जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी ने साइन नहीं किए थे। तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी मो. मुश्ताक के मुताबिक आठ दिसंबर डाटा भेजने की अंतिम तारीख थी। इस बाबत डीएम ने निर्देश जारी किए कि तत्काल जो शुद्ध डाटा है, उसे शासन को भेजा जाए। ऐसे में जांच कराकर ही डाटा शासन को भेजा गया था।
पुराना है यह खेल
छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति का यह खेल पुराना है। हैरत की बात यह है कि इसकी जांच में कई बार जिला समाज कल्याण अधिकारियों पर गाज गिर चुकी है। लेकिन सुधार नहीं हो रहा है। आलम यह है कि ब्लैक लिस्टेड कॉलेजों तक को छात्रवृत्ति एवं शुल्क प्रतिपूर्ति जारी किया गया। फर्जी छात्रों का रैकेट तैयार किया गया, तो पहले साल दाखिला लेता। शुल्क प्रतिपूर्ति हड़पता और फिर से अगले साल दूसरे कोर्स में प्रथम वर्ष में एडमिशन ले लेता। ऐसे में शासन ने निर्देश दिए थे कि कोर्स छोड़ने वाले को दूसरे कोर्स में शुल्क प्रतिपूर्ति नहीं मिलेगी। इस पर नाम बदलकर भी यह खेल खेला गया। मेरठ में ऐसे कई पुराने मामले हैं जिन पर मुकदमे भी दर्ज हुए थे।
पांच कॉलेज हुए थे नामजद
वर्ष 2013-2014 के प्रतिपूर्ति शुल्क में भारी खेल हुआ था। इसी का परिणाम रहा कि पांच विद्यालय संचालकों पर मुकदमे हुए थे। यही नहीं, शासन ने तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी, तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक तथा तत्कालीन क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी को सस्पेंड कर दिया था। दसवीं कक्षा से ऊपर छात्रवृत्ति एवं प्रतिपूर्ति शुल्क में खेल हुआ था।
बिना अनुमोदन डाटा भेजा
पूर्व समाज कल्याण अधिकारी ने बिना समिति के अनुमोदन के शासन को डाटा भेजा था। यह समिति डीएम द्वारा गठित की जाती है। यदि समिति के अनुमोदन पर डाटा भेजा जाता, तो इस तरह की खामियां न मिलतीं। -उमेश द्विवेदी, जिला समाज कल्याण अधिकारी