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15 सीबीएस: यहां तैयार होते हैं सेना के जांबाज, 21 साल पहले मेरठ के बेटे ने संभाली थी कमान

Sun, 02 Sep 2018 05:25 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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कर्नल सतीश चंद त्यागी रिटायर्ड - फोटो : अमर उजाला
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दक्षिण श्रीनगर के पंपोर में सेना का ये इकलौता ऐसा स्कूल है जहां पर वो जुबान सिखाई जाती है, जिसे आतंकी समझते हैं। इस स्कूल में आने के बाद फौजी का न सिर्फ दिमाग बदल जाता है बल्कि उसमें वो फौलाद भी पैदा हो जाता है जिससे देश को दुश्मनों को सबक सिखाया जा सके।  जानें कैसे तैयार होते हैं ये जांबाज:-

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1 सितंबर 1997 को हुई थी इस स्कूल की स्थापना

सेना के अधिकारियों कर्नल सतीश चंद त्यागी - फोटो : अमर उजाला
इस स्कूल की ट्रेनिंग का स्तर आपको मेन गेट पर लिखे स्लोगन से ही पता चल जाएगा...'फ्यूचर विक्ट्री बिगिन हियर।' यानी  भविष्य की जीत यहां से शुरू होती है। शनिवार को इस स्कूल की स्थापना हुए 21 साल पूरे हो गए। सेना को उच्च स्तर के लड़ाके देने वाले इस स्कूल की सबसे पहली कमान अपने मेरठ के कर्नल सतीश चंद्र त्यागी (रिटायर्ड) के हाथों में रही थी। तारीख थी 1 सितंबर 1997, श्रीनगर में पंपोर के पास सेना के इस खास स्कूल 15 कॉर्प्स बैटल स्कूल की शुरुआत हुई।

दिल्ली से सेना में अफसर रिटायर कर्नल सतीश चंद्र त्यागी को यहां का फाउंडर कमांडेंट बनाकर भेजा गया था। इस स्कूल में सैनिकों को आतंकियों से लड़ने की खास ट्रेनिंग दी जाती है। कश्मीर में विभिन्न समस्याओं के बीच आतंकियों से कैसे मुकाबला करना है। किस तरह से आतंकी महिलाओं-बच्चों की आड़ लेते हैं। किस तरह से सीमा पार से यहां आकर वे ठिकाना बनाते हैं। कैसे पैसे जुटाते हैं। इन तमाम बारीकियों से रूबरू कराया जाता है।

सुबह चार बजे शुरू हो जाते हैं जवानों के कठिन ड्रिल

भारतीय सेना
बम डिफ्यूज करने से लेकर तमाम दूसरी तकनीकी जानकारी के बाद शुरू होती है सेना की स्पेशल ट्रेनिंग। सुबह के चार बजे से चलने वाली ये कठोर ट्रेनिंग रात के 12 बजे तक चलती है। जवानों को फौलाद बनाया जाता है।
हेलीकॉप्टर तक से जंप करने के बाद किस तरह से ऑपरेशन को अंजाम देना है। कहां बंकर से अचानक निकलकर आतंकी आप पर हमला कर सकते हैं। किसी तरह से महिलाओं के साथ छिपकर वो वार करते हैं। रात को कहीं पर सर्च ऑपरेशन कैसे किया जाता है। ये तमाम बातें घाटी में तैनात किए जाने वाले जवानों को यहीं सिखाई जाती हैं।

 
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कारगिल युद्घ में तैनात भारतीय सेना के अधिकारी - फोटो : अमर उजाला
1997 से 2000 तक यहां पर कमांडर रहे सतीश चंद्र त्यागी बताते हैं कि 1999 में कारगिल के युद्घ में भी इस स्कूल से ट्रेंड जवानों ने अहम भूमिका निभाई थी। अब तक इस स्कूल से लाखों जवान ट्रेनिंग ले चुके हैं। रिटायर कर्नल त्यागी बताते हैं कि सेना का ये स्कूल ऐसा ट्रेनिंग सेंटर हैं जहां पर आने के बाद जवानों का पूरा नजरिया बदल जाता है। वे दुर्गम से दुर्गम जगह पर कैसी भी परिस्थितियों में दुश्मनों से लोहा लेना सीख जाते हैं। सेना के साथ ही यहां पर पैरा मिलिट्री फोर्स और पुलिस को भी विशेष ट्रेनिंग दी जा चुकी है। 

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