बिजनौर। एनजीटी ने खेतों में फसलों के अवशेष जलाने पर रोक लगाई हुई है, इसका कोई समाधान भी किसानों के पास नहीं था, लेकिन अब वेस्ट डी कंपोजर बैक्टीरिया इस समस्या का समाधान लेकर आया है। यह बैक्टीरिया पराली और गन्ने की पत्ती को खेत में गलाकर खाद बना देगा। इससे इन्हें खेत में जलाने से होने वाले प्रदूषण पर रोक लगेगी साथ ही खेत की मिट्टी में जीवांश पदार्थों की मात्रा बढ़ेगी। इसपर लागत भी अधिक नहीं आनी है। एक लीटर बोतल की कीमत मात्र 20 रुपये हैं। इससे 190 लीटर का घोल तैयार होगा। पांच-छह लीटर एक बीघा जमीन के लिए पर्याप्त होगा।
खेतों में फसलों के अवशेषों को जलाने से फसलों और मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि करने वाले कीट और बैक्टीरिया भी नष्ट हो जाते हैं। पौधों की जड़ी, पत्ती, तने आदि से खेतों में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, जीवांश कार्बन आदि की पूर्ति होती है। अगर खेतों में जीवांश पदार्थों की कमी हो तो उसमें डाली गई खाद का असर बहुत कम समय तक रहता है और फसल का उत्पादन कम होता है। इस कारण खेतों में उत्पादन बढ़ाने के लिए अंधाधुंध खाद प्रयोग किया जा रहा है। यह स्थिति जमीन की उर्वरकता के लिए बहुत नुकसानदायक है। फसलों में जीवांश पदार्थ कम होने से जमीन रेगिस्तानी मिट्टी में परिवर्तित होने लगती है। अपशिष्ट पदार्थों को कुछ ही दिन में गलाकर जीवांश पदार्थ बनाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने वेस्ट डी कंपोजर नाम का बैक्टीरिया विकसित किया है। यह बैक्टीरिया खेत में पानी देते समय डालने पर खेत के सभी कृषि अपशिष्ट को गला देगा। खास बात यह है कि यह बैक्टीरिया जीवित पौधों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा बल्कि उनके मरे हुए हिस्से को गलाएगा। इसे डालने से अपशिष्ट पदार्थों को बैक्टीरिया 20 दिन में गलाकर खाद बना देगा। इसकी एक लीटर की बोतल की कीमत मात्र 20 रुपये हैं। उपनिदेशक कृषि जेपी चौधरी के अनुसार खेतों को प्राकृतिक तरीके से खाद मिलना बहुत जरूरी है। किसान अपने खेतों में वेस्ट डी कंपोजर का इस्तेमाल कर उर्वरकता बढ़ा रहे हैं।
डेढ़ माह में तैयार हो जाता है बैक्टीरिया
आत्मा परियोजना के निदेशक योगेंद्रपाल सिंह योगी के अनुसार एक ड्रम में दस लीटर पानी में वेस्ट डी कंपोजर की एक लीटर की शीशी डाली जाएगी। इसमे दो किलो गुड़ भी डाला जाएगा। एक हफ्ते बाद इसमे 190 लीटर और पानी मिला लिया जाएगा। इस घोल में 20 दिन में ही बैक्टीरिया विकसित हो जाएगा। इसका खेत में स्प्रे किया जा सकता है या यह घोल सिंचाई करते वक्त पानी में बूंद-बूंद करके डाला जा सकता है। पांच छह लीटर घोल एक बीघा खेत के लिए पर्याप्त होता है।
गोबर की खाद के मुकाबले जल्दी होता है तैयार
खास बात यह है कि ड्रम में 20 लीटर घोल बचने पर इसे फिर से भर दिया जाए तो फिर से 20 दिन में बैक्टीरिया विकसित हो जाते हैं। किसानों के पास गोबर की खाद समय से तैयार नहीं हो पाती है। गोबर की खाद बनने में आठ महीने तक का समय लगता है। अगर कूड़ी पर वेस्ट डी कंपोजर का स्प्रे किया जाए तो बैक्टीरिया डेढ़ महीने में ही खाद तैयार कर देगा। खेत में डाला गया ताजा गोबर दीमक का खाना होता है। इससे खेत में दीमक लग जाती हैं और फसल का उत्पादन प्रभावित करती हैं।