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एक मैदान में तीन लाख स्वयंसेवक, आवाज सिर्फ सरसंघ चालक की

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तीन लाख स्वयंसेवक, आवाज सिर्फ सरसंघ चालक की
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मेरठ। एक मैदान में तीन लाख लोगों की भीड़ और मंच से आवाज सिर्फ उनके संगठन प्रमुख की ही गूंजे तो इससे बड़ा अनुशासन और समर्पण शायद ही कहीं नजर आए। शारीरिक अभ्यास के दौरान स्वयंसेवक बेहद व्यवस्थित नजारा पेश कर रहे थे। न तो कोई शोरशराबा और न ही कोई अनुशासनहीनता। संघ नेताओं की एक आवाज पर स्वयंसेवकों की भीड़ का खड़े होना, बैठना और चल देना। यही नहीं तपते सूरज के नीचे गर्मी और उमस में भी एकाग्र चित्त होकर बैठना एक बार फिर संघ के अनुशासन की छाप छोड़ गया।
जागृति विहार एक्सटेंशन में आयोजित राष्ट्रोदय कार्यक्रम स्थल को सफेद और भगवा रंग से सजाया गया था। मुख्य द्वार हो फिर पर्दे, सभी पर भगवा व सफेद रंग भव्यता रूप लिए हुए था। हालांकि मुख्य मंच पर कई रंगों का संगम रहा। जहां भगवा रंग के झंडे लगे थे, वहीं इनके बीच में खाकी पेंट, सफेद शर्ट और काली टोपी पहने सभी आयु वर्गों के स्वयंसेवक शारीरिक अभ्यास कर रहे थे। करीब तीन लाख स्वयंसेवकों का एक साथ सधे अंदाज में शारीरिक कौशल का परिचय देना अलग ही छटा बिखेर रहा था। स्वयंसेवक एकता और अखंडता के साथ आम जनमानस को अनुशासन का भी संदेश दे गए।
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भीड़ नहीं दिशा-निर्देश अहम
संघ के कार्यक्रम अनुशासन की पहचान रखते हैं। लेकिन बात अगर मेरठ की करें तो अब तक यहां पर पिछले एक दशक में जो कार्यक्रम हुए हैं, उनमें संख्या 10 हजार से ज्यादा नहीं रही। वैसे भी राष्ट्रोदय संघ का देश में आज तक का सबसे बड़ा आयोजन था। जिसे लेकर संघ नेतृत्व भी तनाव में था। क्योंकि तीन लाख से ज्यादा स्वयंसेवकों के पंजीकरण होने के बाद विशाल व्यवस्थाओं के बीच अनुशासन को कायम रखना बड़ी चुनौती थी। लेकिन संघ के स्वयंसेवकों ने एक बार फिर दिखा दिया कि भीड़ नहीं बल्कि संगठन का दिशानिर्देश उनके लिए अहम है।
इस अनुशासन की सर्वत्र प्रशंसा
बसों से उतरकर पंक्तिबद्ध होकर कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने से लेकर मैदान में बैठने, शारीरिक क्रियाओं के साथ ही वापसी में भी उसी अनुशासन के तहत वापस जाने की सभी ने सराहना की। यही नहीं जब सरसंघ चालक ने स्वयंसेवकों के बीच खुली जीप से भ्रमण किया तो एक भी स्वयंसेवक अपनी जगह से हिला तक नहीं। इसके साथ ही किसी स्वयंसेवक ने कार्यक्रम समापन तक किसी भी नेता के साथ फोटो आदि खिंचाने तक का प्रयास नहीं किया। वहीं, जब प्रवेश द्वारों पर स्वयंसेवकों की प्रवेशिका की जांच के दौरान भीड़ इकट्ठा होना शुरू हुई तो उसके दबाव के बावजूद स्वयंसेवक शांत रहे।
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पुलिस को दे गए सीख
राष्ट्रोदय स्थल के चप्पे-चप्पे पर वॉकी-टॉकी लेकर स्वयंसेवक सुरक्षा में तैनात थे। इन स्वयंसेवकों के साथ हालांकि बाहरी गेटों पर पुलिस भी तैनात थी। लेकिन पूरी कमान प्रशिक्षित स्वयंसेवक के हाथों में थी। पुलिस मौन रहकर स्वयंसेवकों को व्यवस्था संभालते हुए देखती रही। वहीं, राष्ट्रोदय स्थल के भीतर तो पूरी तरह कमान ही स्वयंसेवक संभाले हुए थे। स्वयंसेवकों के अनुशासन, समर्पण और तत्परता को देख पुलिस अधिकारी और कर्मचारी भी हैरान थे। संघ के स्वयंसेवकों की कार्यप्रणाली कहीं न कहीं पुलिस को भी सीख देती नजर आयी।

खास बातें
- शारीरिक अभ्यास में स्वयंसेवकों ने दिया अनुशासन और कौशल का परिचय
- सभी आयु वर्गों के स्वयंसेवकों ने किया राष्ट्रोदय कार्यक्रम में उत्साह से प्रतिभाग
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