न्यायमूर्ति पीएन भगवती ने कहा था कि देर से मिला न्याय न्याय नहीं रह जाता। लेकिन इसके विपरीत अदालतों में पीठासीन अधिकारियों की कमी व मुकदमों की संख्या के हिसाब से न्यायालय कार्यरत न होने के चलते लोगों को न्याय पाने में विलंब हो रहा है।
जनपद में लंबित मुकदमों की संख्या पर नजर डालें तो विभिन्न प्रकृति के कुल 73653 मामले लंबित हैं। इसमें 40042 मामले फौजदारी तथा 33611 मामले सिविल के है। लंबित मुकदमों की संख्या के हिसाब से कम से कम तीस से अधिक न्यायालय की आवश्यकता है। जबकि मात्र 16 न्यायालय ही कार्यरत हैं। इसमें भी तीन में पीठासीन अधिकारी तैनात नहीं है।
दीवानी कचहरी के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी सैयद मुख्तार अहमद कहा कहना है कि लंबित मुकदमों के निस्तारण के लिए 16 न्यायालय हैं। लेकिन यह नाकाफी है। करीब 30 कोर्ट की आवश्यकता है। सिविल कोर्ट सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष शम्सुल हसन का कहना है कि लंबित मुकदमों की संख्या के हिसाब से 50 कोर्ट की आवश्यकता है।
जिसमें एसीजेएम की तीन, अपर सिविल जज सीनियर डिवीजन के दो के अलावा जूनियर डिवीजन में कोर्ट स्थापित किए जाने की जरूरत है।
मुकदमों की संख्या के बाबत बताया कि अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायिक अधिकारियों की कमी व रिक्त पड़े न्यायालयों के चलते मुकदमों के निस्तारण में देर होती है। सिविल कोर्ट सेंट्रल सेंट्रल बार के महामंत्री दारोगा सिंह ने बताया कि वर्तमान में कार्यरत कोर्ट से तीन गुना न्यायालयों की आवश्यकता है। इसके लिए जिले के प्रशासनिक न्यायाधीश से भी मिलकर समस्या से अवगत कराया गया है।