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पिता के अनुशासन और प्रेरणा से आज मिला आईएएस का मुकाम

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अपने पिता सतीश कुमार और माता के साथ आईएएस ज्वाइंट मजिस्ट्रेट अतुल वत्स। - फोटो : MAU
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मऊ। पुरानी कहावत है कि खेती बढ़े अपने कर्मे पुत फले पिता के कर्मे, तो ऐसे में पुत्र की सफलता में पिता के योगदान से इंकार नही किया जा सकता। आज मऊ जिले के ज्वांइंट मजिस्ट्रेट और एसडीएम सदर आईएस बने तो पिता के द्वारा दिए गए अनुशासन के चलते। बोले पिता की प्रेरणा सलाह और अनुसरण किया उन्हे मंजिल मिल गई। आज वो सर्वोच्च मुकाम पर आसीन है।
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जनपद की सदर तहसील पर उपजिलाधिकारी के पद पर तैनात अतुल वत्स आईएएस हैं। इनका मानना है कि आज वे इस मुकाम पर अपने पिता सतीश कुमार के अनुशासन और प्रेरणा की बदौलत हैं। हरियाण के सोनीपत शहर के मूल निवासी अतुल वत्स कहते हैं कि उनके पिता 17 वर्ष की अवस्था में फौज में चले गए। उन्होंने सेना में रहते हुए अपनी बेहतर सेवाएं दी। कारगिल युद्ध में उन्होंने सेना में रहते हुए अपने कौशल का परिचय दिया। सेना में कठोर अनुशासन प्रिय पिता ने हमें अनुशासन का पालन करने की सीख दी।
सैनिक स्कूल से 12 वीं की परीक्षा 92 प्रतिशत से अधिक अंकों से पास करने के बाद मैंने सेना में जाने की इचछा पिताजी से बताई तो उनका कहना था कि प्रशासनिक सेवा में स्थान बनाओ। पिता की प्रेरणा से मेरा रुझान प्रशासनिक सेवा की ओर हुआ। पिता ने कहा कि सुबह आठ बजे से शाम बजे तक लाइबग्रेरी जरूर जाओ , चाहे पहां पढ़ो या न पढ़ो। लाइब्रेरी में जाने पर गहन अध्ययन में अभिरूचि बढ़ती गई । पिता के अनुशासन और धैर्य के साथ आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा ने प्रशासनिक सेवा में मुकाम हासिल करने में काफी मदद की। जब जब कोई समस्या आती तो उनका धैर्य के साथ समाधान करने में पिता की सीख ने ही मदद की।
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वहीं, जिले से लेकर बलिया और गाजीपुर तक शिक्षण संस्थाओं का बेहतर संचालन करने वाले युवा मुरलीधर यादव कहते हैं कि आज वे जिस मुुकाम पर पहुंचे हैं उसमें पिता का योगदान अतुलनीय है। जनपद में लिटिल फ्लावर स्कूल आजाद हिंद पीजी कालेज सहित दर्जन भर शिक्षण संस्थाओं के संस्थापक पिता विजय शंकर यादव ने अल्पवेतन भोगी अध्यापकों के समक्ष आने वाली चुनौतियों को नजदीक से अनुभव किया था।
उन्होंने ठान लिया कि वे स्वयं अच्छे स्कूल की स्थापना करेंगे और उस स्कूल में अध्यापन के लिए योग्य अध्यापकों को अच्छे वेतन पर बेहतर कार्य करने का अवसर देंगे। उनके दृढ़ संकल्प शक्ति का नतीजा है कि जिले से बलिया जनपद तक शिक्षण संस्थाओं की श्रृंखला खड़ी कर दिया। यह बातें युवा मुरलीधर यादव कहते हैं कि उनके पिता के पास धन भी कम था लेकिन उनके पास कठोर परिश्रम, अनुशासन, लगन, ईमानदारी और कार्य के प्रति उत्तरदायित्व की दृढ़ इच्छा शक्ति ने सफलता की मंजिलें हासिल करने में काफी मदद किया।
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