जिले के नगरीय इलाकों से लेकर नगर पंचायत इलाकों में बिजली के खंभे और डिवाइडरों के साथ सार्वजनिक स्थानों पर हजारों होर्डिंग-बैनर शोभा बिगाड़ रहे हैं। नगरीय इलाकों में कोई मानक न होने के कारण आज तक होर्डिंग व बैनरों पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी।
हर बार जब चुनावी अधिसूचना जारी होती है। उसके बाद ही होर्डिंग-बैनर उतरवाए जाते हैं। इसके पहले होर्डिंग बैनर शहर की सुंदरता को प्रभावित करते रहते हैं। जिले में मऊ नगर पालिका के अलावा घोसी, मधुबन, मुहम्मदाबाद गोहना, कोपागंज, दोहरीघाट जैसी बड़ी नगर पंचायतें है।
अब तक किसी भी नगर पंचायतों में होर्डिंग बैनर को लेकर कोई नियमावली नहीं आई हैं। जिसका फायदा उठाकर कुछ ठेकेदार होर्डिंग बैनर का न सिर्फ ठेका लेते हैं, बल्कि जिले भर में जगह-जगह अवैध तरीके से होर्डिंग-बैनर लगाकर नगर की सुंदरता को भी प्रभावित करते हैं।
जिले में होर्डिंग-बैनर लगाए जाने की सबसे अधिक डिमांड मऊ नगर पालिका के साथ घोसी, कोपागंज और दोहरीघाट के मुख्य मार्ग में होती हैं। बीते एक दशक में जिला पंचायत, लोकसभा, विधानसभा और निकायों में कुल सात से आठ बार चुनाव हुए हैं।
हर बार जब चुनावी अधिसूचना जारी होती है तो निकायों प्रशासन द्वारा अवैध होर्डिंग को हटाने पर कार्रवाई की जाती रही है। इस दौरान अभियान चलाकर होर्डिंगों को उतारा जाता है, लेकिन इसके होर्डिंग व बैनर लोगों के घरों और अंडरपास, ओवरब्रिज की दिवारों के साथ बिजली के खंभों पर सजे रहते हैं।
सबसे अधिक होर्डिंग बैनर निजी संस्थान जैसे स्कूल, अस्पताल और लॉन आदि के लगे हैं। वहीं तमाम निजी कंपनियां भी ठेकेदारों से संपर्क कर होर्डिंग आदि लगवाती रहती हैं।
ठेकेदारों के रेट तय, निकायों के राजस्व का नुकसान
जिले में होर्डिंग व बैनर को लेकर कोई नियमावली न होने से इसका फायदा निजी ठेकेदार उठाते हैं। अलग-अलग बाजारों में अलग-अलग रेट तय हैं। साइज और एरिया के हिसाब से ठेकेदार लोगों का ठेका लेकर नगर भर में होर्डिंग-बैनर लगवाते हैं। निजी मकानों पर अगर कोई मना भी करता है तो उसे 200-400 रुपये देकर मना लेते हैं। वहीं सरकारी जगहों पर न कोई शुल्क और न ही कोई कार्रवाई होने से इनकी चांदी रहती है।