जिले में 200 से ज्यादा छोटे- बड़े अस्पताल हैं। 100 बेड के 20 अस्पतालों में महज छह के पास खुद की एंबुलेंस है। वहीं 50 बेड के अस्पतालों की संख्या 34 हैं, लेकिन केवल आठ के पास खुद की एंबुलेंस है।
एआरटीओ के आंकड़ें के अनुसार जनपद में 98 एंबुलेंस पंजीकृत हैं। 13 एंबुलेंस ऐसे हैं जो केवल डॉक्टर के नाम पर पंजीकृत हैं, जबकि जन सेवा समितियों के नाम पर 32 एंबुलेंस पंजीकृत हैं।
एक एंबुलेंस मऊ निवासी एक व्यक्ति के नाम से है जिसका पंजीकरण वाराणसी रोहनिया स्थित हॉस्पिटल के नाम से कराया गया है। वहीं दो एंबुलेंस लखनऊ की एक संस्था के नाम पर पंजीकृत हैं।
इन आंकड़ों के अनुसार 133 निजी अस्पताल उधार की एबुलेंस की सहारे संचालित हो रहे हैं। एक एबुलेंस पर करीब छह से सात अस्पतालों की जिम्मेदारी है। निजी अस्पतालों में मरीज के रेफर होने के करीब आधे घंटे बाद ही एबुलेंस का सायरन सुनाई देता है।
इस बीच चिकित्सक, तीमारदार और मरीज की जान सांसत में पड़ी रहती है। जिले में 11 में से चार नर्सिंग होम के पास ही खुद की एबुलेंस हैं। इन अस्पतालों को 22 बिंदुओं के आधार पर पंजीयन कराया जाता है।
जिसमें फायर सेफ्टी, चिकित्सक की डिग्री, इमरजेंसी, ओपीडी हाल के अलावा पार्किंग समेत अन्य बिंदुओं के आधार पर लाइसेंस दिया जाता है। वहीं एबुलेंस के मानक में इन्हें केवल यह बताना होता है कि वे जरूरत पड़ने पर आवश्यक रूप से मरीज को समय से एबुलेंस उपलब्ध कराएंगे।
इन अस्पतालों में हर दिन बड़ी संख्या में लोग उपचार कराने जाते हैं। अधिकतर गंभीर केस के मरीज ही निजी अस्पतालों में पहुंचते हैं। इन अस्पतालों में बिल बनाने के चक्कर में मरीजों का आखिरी तक उपचार किया जाता है।
गंभीर होने पर वाराणसी रेफर किए जाते हैं। इस दौरान निजी अस्पताल संचालक अन्य अस्पतालों से संपर्क कर एबुलेंस बुलाते हैं। इन सभी प्रक्रिया में आधे घंटे से अधिक का समय जा रहा है।
जिले में आठ एबुलेंस सर्विस सेवा
जिले में निजी अस्पतालों के पास एबुलेंस भले ही न हों, लेकिन जनपद में आठ एबुलेंस सर्विस सेवाएं संचालित हैं। इनमें किसी के पास एक तो किसी के दो एबुलेंस हैं। इन एबुलेंस संचालकों को एआरटीओ से परमिट लेने के बाद स्वास्थ्य विभाग से एनओसी लेनी होती है। विभागीय अधिकारी इन एबुलेंस में व्यवस्थाओं की जांच करने के बाद ही इन्हें एबुलेंस संचालित करने की अनुमति देते हैं।
100 बेड के निजी अस्पताल की संख्या 20
सीएमओ कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार जिले में 100 बेड के निजी अस्पताल की संख्या 20 जबकि 50 बेड वाले अस्पतालों संख्या 34 है। वहीं नर्सिंग होम की संख्या 40 और मेडिकल क्लिनिक 29 है। पूरे अस्पतालों पर 52 एंबुलेंस हैं। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक पंजीकरण से पहले 22 बिंदुओं की जांच की जाती है। उसमें एंबुलेंस का कॉलम नहीं होता है, लेकिन नर्सिंग होम संचालकों को यह दिखाना पड़ता है कि किस एंबुलेंस को अटैच किए हैं। उसी के आधार पर लाइसेंस जारी होते हैं।
नियम नहीं लेकिन बड़े अस्पताल में एंबुलेंस होना जरूरी
मऊ। सीएमओ डॉक्टर संजय गुप्ता ने बताया कि सभी निजी अस्पतालों के लिए खुद की एंबुलेंस होना अनिवार्य नहीं है लेकिन मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पतालों के लिए यह जरूरी होता है। खासकर नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स जैसी मान्यता प्राप्त करने के लिए। यह आपातकालीन सेवाओं और पेसेंट ट्रांसफर के लिए जरूरी है, खासकर एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट की आवश्यकता होने पर, जो कि एनएबीएच के मानकों का हिस्सा है। छोटे क्लीनिक या नर्सिंग होम के लिए यह नियम अलग हो सकता है, पर बड़े अस्पतालों के लिए परिवहन और अस्पताल के बीच समन्वय के लिए एंबुलेंस ज़रूरी है।
कमीशन का नेटवर्क
इन निजी एंबुलेंस संचालकों के द्वारा कमीशन के तौर पर भी भारी राशि वसूल की जाती है। निजी अस्पतालों से रेफर होने वाले मरीजों से एंबुलेंस संचालक 30 प्रतिशत तक कमीशन लेते हैं और मरीजों को ऐसे डॉक्टरों के पास भेजते हैं जिनकी सेटिंग उनके साथ होती है। इस खेल से मरीज और उनके परिजन दोनों ही परेशान हो रहे हैं, जबकि इन एंबुलेंसों में जरूरी चिकित्सा उपकरण और सुविधाएं भी नहीं होती हैं। स्वास्थ्य विभाग के पास इन एंबुलेंस की कोई जानकारी नहीं है, और न ही किसी प्रकार की कोई निगरानी व्यवस्था है। इसका फायदा उठाकर निजी एंबुलेंस संचालक मरीजों व परिजनों से ज्यादा राशि वसूल रहे हैं। शहर में ही 50 से अधिक निजी एंबुलेंस चल रही हैं, जो मरीजों से मनमाने तरीके से फीस वसूलती हैं।
100 बेड वाले छह अस्पतालों के पास खुद के एंबुलेंस हैं। 50 बेड, नर्सिंग होम सहित कुछ अन्य अस्पतालों के पास खुद का एंबुलेंस है। मरीज को एंबुलेंस समय पर न मिलने की अब तक शिकायत नहीं आई।
- डॉ. संजय गुप्ता, सीएमओ, मऊ