सीजेएम ने दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने तथा पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों की जांच और सुनवाई के बाद रामप्रवेश यादव, अंगद वर्मा, कमलेश कुमार यादव, उदय नारायण यादव, कृष्णानंद मौर्य, वीरेंद्र चौहान, रविंद्र नाथ पटेल और धर्मेंद्र विश्वकर्मा को उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) अधिनियम की धारा 10 के तहत दोषी पाया।
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तत्कालीन डीआईओएस बृजेश कुमार ने दर्ज कराई थी प्राथमिकी
सामूहिक नकल की शिकायत मिलने के बाद डीएम और डीआईओएस बृजेश कुमार ने कृषक इंटर कॉलेज में छापे मारे थे। संदिग्ध गतिविधियां मिलने पर दोनों अधिकारियों ने छात्रों की कापी चेक की। एक जैसा जवाब लिखा मिला, वहीं पूछने पर विद्यार्थी कॉपी में लिखे उत्तर को नहीं बता पाए थे। इससे स्पष्ट हुआ कि यहां छात्रों को सामूहिक रूप से बोलकर नकल कराई गई थी।
इसके बाद इस मामले में माध्यमिक शिक्षा परिषद के सचिव अमरनाथ वर्मा के निर्देश पर डीआईओएस ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी। साथ ही कॉलेज को ब्लैक लिस्टेड कर परीक्षा निरस्त कराकर दुबारा कराई गई। कॉलेज प्रबंधक सहित कालेज के 22 शिक्षकों के खिलाफ केस दर्ज कराया था। इस मामले में न्यायालय में न आने पर 22 में से 14 लोगों की पत्रावाली अलग कर दी गई। वहीं नियमित आने वाले 8 लोगों की अलग पत्रावली की सुनवाई की जा रही थी। जिसमें यह फैसला सामने आया।