मऊ। जिले में नौ बड़े निजी तथा आठ सरकारी अस्पताल आयुष्मान योजना के तहत पंजीकृत है। योजना के तहत एक लाख से ज्यादा परिवार इस योजना के तहत पंजीकृत है। इसके बाद भी आयुष्मान योजना जिले में कुछ हद तक ही सफल होती दिख रही। कारण सरकारी अस्पतालों में संसाधन का अभाव है, इसके चलते सुविधा न मिलने पर मरीज अपना उपचार कराने के लिए बाहर जा रहें। आंकड़े के अनुसार अभी तक 11 सौ से ज्यादा मरीज अपना उपचार कराने के लिए दूसरे जिले जा चुकें हैं। इसके मुख्य कारण योजना में चयनित अस्पतालों में सधारण रोगों को छोड़ अन्य बीमारियों के उपचार का बेहतर साधन का न होना।
जिले में आयुष्मान योजना के तहत 1 लाख 3 हजार 367 परिवार पंजीकृत है। इन परिवारों को निशुल्क उपचार के लिए जिले में 16 अस्पताल चिह्नित किए गए हैं। इसमें निजी अस्पतालों में फातिमा, प्रेमा नेत्रालय, गुप्ता सर्जिकल, शारदा नरायण अस्पताल, प्रकाश अस्पताल, वंदना नर्सिग होम, स्वास्तिक अस्पताल, आशीष अस्पताल, राहुल अस्पताल आदि को शामिल किया गया है। जबकि सरकारी अस्पतालों में जिला, महिला जिला अस्पताल, कोपागंज, घोसी, मुहम्मदाबाद गोहना, फतेहपुर मंडाव, रतनपुरा, बड़राव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पंजीकृत है। निजी अस्पतालों में संसाधन है, लेकिन हर क्रिटकल बीमारियों के विशेषज्ञ नहीं है। इस क्रम में सरकारी में संसाधन के साथ साथ विशेषज्ञों की कमी है।
योजना के शुरू हुए दो साल हो चुके हैं, लेकिन जिला अस्पताल में इस योजना के तहत एक भी मरीज का उपचार नहीं हो सका। यहीं हाल नेत्र विभाग और दंत रोग विभाग का है। हालात यह है कि 16 अस्पताल होने के बाद भी 11 सौ से ज्यादा मरीज दूसरे जिला जाकर अपना उपचार कराए।
विभागीय आंकड़ों को देखे तो 23 सितंबर 2018 को आयुष्मान योजना का शुभारंभ हुआ था। सितंबर 2020 तक 1925 लोगों का इस योजना के तहत उपचार किया गया है। जिसमें 500 लोगों ने जिले के पंजीकृत अस्पतालों में अपना उपचार कराया। जबकि गंभीर बीमारी से ग्रसित लोग अपना उपचार कराने के लिए बाहर चले गए। इस वर्ष सिर्फ 500 मरीज इस यही 500 सौ से ज्यादा मरीजों ने वाराणसी, आजमगढ़, गोरखपुर, लखनऊ आदि जगहों पंजीकृत अस्पतालों में अपना इलाज कराया।
वर्ष 2019 में 419 मरीज वाराणसी, गोरखपुर या दूसरे जिलों के अस्पताल में पहुंचकर इलाज कराया। उधर विभाग की लापरवाही तथा अस्पताल प्रबंधनों की उदासीनता के बीच परेशान मरीज और उसके परिवारों का कहना है, कि नि:संदेह योजना गरीबों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं हैं, लेकिन इसमें पंजीकृत निजी अस्पतालों की संख्या अधिक हो और सरकारी अस्पतालों में चिकित्सक और संसाधन मुहैया हो तो इलाज में आ रही परेशानियां दूर होने से योजना बेहद सफल होगी।