लगातार तीन वर्ष में बारिश की कमी के कारण धरती की कोख सूखने लगी है। भूगर्भ जलस्तर लगातार नीचे खिसकता जा रहा है। नहर विहीन क्षेत्रों में तो स्थिति और भी भयावह हो गई है। जिले के हजारों निजी नलकूप सूख गए हैं। किसानों को अपनी फसल बचाने के लिए विकल्प खोजना पड़ रहा है या सूखे की मार झेलनी पड़ रही। गन्ना पेड़ी तो किसानों की आंखों के सामने ही सूखती ही जा रही है। पशुपालक हरे चारा भी सही से और समय से नहीं उगा पा रहे। इससे पशुओं के चारे का भी संकट उत्पन्न होने लगा है।
पिछले तीन वर्ष से लगातार अवर्षण की मार से जनपदवासी जूझ रहे हैं। पिछले साल तो काफी भीषण सूखा पड़ा। जुलाई, अगस्त, सितंबर और अक्टूबर महीनों में तो एक बूंद भी पानी नहीं बरसा। इस वर्ष अप्रैल महीने के पहले सप्ताह से ही भीषण गर्मी पड़ रही है। नतीजा यह हुआ कि भूगर्भ जल स्तर लगातार नीचे खिसकता जा रहा है।
जिन क्षेत्रों में धरातल पर वाटरपंप लगाकर किसान सिंचाई करते थे उन क्षेत्रों में जलस्तर 24 फीट से भी नीचे चला गया है। इससे आसानी से पानी भी सिंचाई के लिए नहीं मिल रहा। हालांकि जिन क्षेत्रों में नहर से सिंचाई होती है उन क्षेत्रों में वाटर रिचार्जिंग होती रहती है। इसलिए उन क्षेत्रों में भू-गर्भ जलस्तर अपेक्षाकृत कम खतरनाक स्तर पर है । लेकिन जिन क्षेत्रों में नहर अथवा राजकीय नलकूप नहीं हैं उन क्षेत्रों में तो जल स्तर काफी नीचे चला गया है। इससे लोगों को पानी का इंतजाम करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा।