जिस प्रकार से उर्दू और अंग्रेजी के लोग संगठित हैं और उनका विकास हो रहा है। उसी प्रकार से संस्कृत से जुड़े लोगों को संगठित होने की जरूरत है। यह बात संस्कृत भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश कामत ने नगर क्षेत्र के दशई पोखरा स्थित डानवास्कों स्कूल में प्रेसवार्ता के दौरान कही। वे स्कूल में आयोजित संस्कृत भारती के तत्वावधान में आयोजित शिविर के समाप समारोह में भाग लेने के लिए आए थे।
उन्होंने कहा कि संस्कृत न तो केवल भाषा है। ये भारत के ज्ञान विज्ञान की भारतीय संस्कृति की वाहक है। भारत की पहचान है। संस्कृत का पुनरुजीवन भारत का ही पुर्नजीवन है। संस्कृत के पुनरुत्थान के लिए संस्कृत भारती संस्था कार्यरत है। उन्होंने कहा कि संभाषण शिविर में दो घंटा प्रतिदिन देने पर मात्र दस दिनों में कोई भी संस्कृत बोलना सीख सकता है। ऐसे शिविर में भारत में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। इन शिविरों में 90 लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया है। उन्होंने बताया कि विश्व के 28 देशों के 254 विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जाती है। उन्होंने कहा कि संस्कृत सर्वत्र ले जाने की संस्कृत सब लोगों की अभियान में लाखों युवा जुट रहे हैं। बताया कि उत्तर प्रदेश में 6 और पूरे भारत में 34 वर्ग शिविर चल रहे हैं। उन्होंने सभी से संस्कृत को आगे ले जाने के लिए अपील की।