मऊ। नगर के भुजौटी स्थित राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ सभागार में मंगलवार की शाम राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ और जन संस्कृति मंच के संयुक्त आयोजन में गोष्ठी हुई। इसमें प्रसिद्ध नाटककार, साहित्यकार मोहन राकेश के जन्मशती वर्ष पर मोहन राकेश का रचना संसार और विचार विषय का चर्चा हुई। गोष्ठी की शुरुआत अशोक चौधरी और बंटू की ओर से गाये गोरख पाण्डेय के गीतों से हुई।
वहीं गोष्ठी को संबोधित करते हुए धनंजय शर्मा ने कहा कि आजादी के बाद 1950 से 1970 के संक्रमण काल के दौर में औद्योगिकरण, पूंजीवाद, वैश्वीकरण, बेरोजगारी नगरीकरण, कुंठा, निराशा, बेचैनी, खीझ, अवसाद, पराजय को केंद्रित करते हुए मोहन राकेश ने नाटक को आधुनिक रूप दिया। वहीं मनोज सिंह ने कहा कि मोहन राकेश के महज तीन नाटकों ने उन्हें साहित्यिक जगत में स्थापित कर दिया। आजादी के बाद बन रहे समाज में आत्मनिर्वासित की परिघटना को मोहन राकेश बखूबी पहचान लेते हैं। औद्योगिक और नगरीय दौर में धीरे-धीरे संबंधों में जटिलता बढ़ती जाती है। संबंधों में बढ़ती जटिलता उनके नाटक में स्पष्ट दिखाई देती है। एक ही छत के नीचे जीवन जी रहे लोग अत्यंत भय, आतंक, दुःख में जी रहे हैं। जन संस्कृति मंच के उत्तर प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर ने कहा कि गांव उजड़कर नगर जब विकसित हो रहे थे उसी समय मोहन राकेश नाटक लिख रह थे। मोहन राकेश आजादी के बाद बनने वाले समाज में पनपते मध्यम वर्ग की चित और चेतना के प्रतिनिधि नाटककार थे। एक ही हवा में सांस लेते अजनबीयत के एहसास को मोहन राकेश ने अपने नाटकों के माध्यम से उजागर किया। मोहन राकेश पूंजीवादी व्यवस्था से व्यक्ति के अंदर आई घुटन और टूटन से आए अंधेरे को अपने नाटकों के माध्यम से प्रस्तुत किया। गोष्ठी में मुख्य रूप से रामनरेश, फरजाना मेहंदी, अनुभव दास, अब्दुल अजीम खां, वीरेंद्र कुमार, कहानीकार हेमंत कुमार, अशोक चौधरी, बंटू, विनोद कुमार सिंह, पुरंजय शर्मा, कन्हैया लाल, रामप्रवेश यादव, मनोज सिंह, ओम प्रकाश, बसंत कुमार, विद्याधर कुशवाहा, रमेश सिंह, सुरेंदर उपस्थित रहे।