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कोर्स पूरा होने से पहले ही एनआरसी छोड़ कर जा रहे कुपोषित बच्चे

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जिला अस्पताल स्थित कुपोषण पुनर्वास केंद्र मंे भर्ती बच्चे। - फोटो : mau
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 सदर अस्पताल में अति कुपोषित बच्चों के इलाज के लिए बने पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती बच्चों के अभिभावक कोर्स पूरा होने से पहले ही उन्हें लेकर चले जा रहे। ऐसा अस्पताल प्रबंधन के लापरवाही के चलते हो रहा। अभिभावकों का कहना है कि एनआरसी मोर्चरी के समीप है और दूसरे पीने के पानी समेत अन्य सुविधाएं नदारद हैं। 26 अप्रैल 2017 से लेकर 28 अगस्त 2018 तक एनआरसी में 280 बच्चे भर्ती हुए। इनमें से 28 बच्चों का इलाज पूरा होने से पहले ही अभिभावक उन्हें लेकर चले गए।  जानकारी होने पर डीएम ने सीएमएस को एनआरसी को अस्पताल के दूसरे जगह पर संचालित करने का निर्देश जारी किया था लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ।
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 जिले में बाल पुष्टाहार विभाग के आंकड़ों में अतिकुपोषित बच्चों की संख्या 14360 और कुपोषित बच्चों की संख्या 47085 है। कुपोषित बच्चों को सुपोषित करने के लिए 10 बिस्तरों के पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में बुधवार को अतिकुपोषित बच्चे पवन पुत्र प्रमोद, आरबी पुत्र अर्जुन, यशवंत पुत्र रमेश, अनामिका पुत्र विष्णु और विकास पुत्र रामप्रवेश सहित 8 बच्चें भर्ती हैं। जिनमें दो बच्चों को बुधवार की शाम भर्ती कराया गया। यह स्थिति तब हैं जब 25 अगस्त को सदर अस्पताल सहित जिले के 9 सीएचसी 38 पीएचसी सहित सभी ब्लाक मुख्यालयों पर सुपोषण मेला का आयोजन किया गया था। जिसमें 100 अति कुपोषित बच्चों की जांच की गई थी। ऐसे में एनआरसी में अभी भी दो बेड खाली हैं।

अमर उजाला द्वारा जांच पड़ताल करने पर एनआरसी में कुुपोषित बच्चों के भर्ती न होने के कारणों का मामला सामने आया। जिसमें एनआरसी केंद्र के समीप मोर्चरी का बना होना मुख्य कारण हैं, इसके अलावा वार्ड में प्रसाधन व्यवस्था के नाम पर एक शौचालय है। जबकि पेयजल का संकट बरकरार है। एनआरसी कर्मचारियों ने पुष्टि करते हुए बताया कि  एनआरसी के आंकड़ों के मुताबित एनआरसी के संचालन 26 अप्रैल 2017 से 28 अगस्त 2018 तक 280 बच्चों को भर्ती कराया गया था। 2 जून 2018 को भर्ती रितिक और सचिन के अभिभावक समस्या के चलते 8 जून को चले गए। वहीं 5 जून को भर्ती सीमा के परिजन भी इस समस्या के चलते 10 जून को पूरा इलाज कराए बगैर चले गए। एक कर्मचारी ने बताया कि विगत एक साल में भर्ती 280 बच्चों में 28 बच्चे 14 दिन के बजाए एक सप्ताह के भीतर ही चले गए। 
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