मुहर्रम की बारहवीं तारीख पर नगर के मालिक टोला इमामबाड़ा में मजलिस का आयोजन किया गया। जिसमें मौलाना शोएब रिजवी साहब ने तकरीर की। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन की शहादत के बाद याजिदी लश्कर ने इमाम के खेमो में आग लगा दी थी।
कहा कि औरतों को बेपर्दा कर दिया। इतना ही नहीं इमाम हुसैन के बड़े बेटे सय्यद सज्जाद के हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेडीयां डालकर हुसैन की चार वर्षीय पुत्री सकीना की कानों से बालिया खिंच ली गई थी। इस दौरान बच्ची तड़प कर रोई तो जालिमों ने उसे और तमाचे जउ़ दिए। वह रोती रही जालिम कहर बरपाते रहें, बाद में औरतों और बच्चों को रस्सियों में जकड दिया गया। कर्बला में न इमाम हुसैन का शव दफन हुआ और ना ही इमाम का तीजा हुआ। आज उन्ही की याद में बारह मुहर्रम को फातिहा मजलिस आयोजित की गई है। इस आयोजन का मकसद है कि इमाम हुसैन का कर्बला में फातिहा करना वाला कोई नही था। क्योंकि इमाम हुसैन के परिवार के सदस्यों को यजीदियो ने बंदी बना लिया था। दो साल बाद जब इमाम हुसैन के परिवार के लोग रिहा हुए तो कर्बला पहुंचकर अपने एहबाब के कब्रों पर गिरियोजारी किए। उसके बाद मदीना पहुंच कर बाहर रुक गए। सय्यद सज्जाद ने बसीर को आलम दे कर कहा की मदीने वालों को हमारे आने की खबर दे दो, और कहना कि हुसैन मार दिए गए है। इसको सुन पूरे मदीने में कोहराम मच गया। उसके बाद मदीने वालो ने रौज ए रसूल पर एक मजलिसे अजा हुई | फिर भूखे और प्यासे हुसैन का फातिहा दिया गया। तभी से हुसैन के चाहने वाले बारह मुहर्रम को हुसैन का तीजा मनाते है और फातिहा करते है और सबको खाना खिलाते है। तकरीर के बाद नौहख्वानी की गयी जिसमे अंजुमन बाबुल इल्म जाफरिया के साहिबे ब्याज मकसूद खान ने नौहा पढा। जिसमें सैय्यद अली अंसर, शुजात अली, आयान,आमान, रेहान, रजा, जावेद, इरफ़ान अली और आसिफ़ रिजवी आदि लोग मौजूद रहे |