दूसरे प्रयास में बने विधायक, लेकिन नफरती भाषण से ढाई साल ही रह सके
नफरती भाषण के कारण विधायकी गंवाने वाले अब्बास अंसारी दूसरे प्रयास में विधायक बने थे। इससे पहले 2017 के विधानसभा चुनाव में मुख्तार अंसारी ने अपने बेटे अब्बास अंसारी को बसपा के टिकट पर घोसी सीट से चुनाव लड़ाया था। भाजपा प्रत्याशी फागू चौहान से कांटे के मुकाबले में सात हजार तीन वोटों से हार का सामना करना पड़ा था।
करीब पांच साल बाद अब्बास ने अपने पिता की परंपरागत सदर विधानसभा सीट से सुभासपा-सपा गठबंधन प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में उसने भाजपा प्रत्याशी अशोक सिंह को 38116 वोटों से हराया है। अब्बास अंसारी को कुल 124691 वोट मिले, जबकि अशोक सिंह को 86575 वोट मिले थे।
सबसे पहले इस सीट से मुख्तार अंसारी के छठवीं बार चुनाव लड़ने की बात कही जा रही थी, लेकिन आखिरी समय पर मुख्तार ने अपने बड़े बेटे को सदर सीट से चुनाव लड़ाया।
जीत के बाद कभी अपने क्षेत्र में नहीं आ सका अब्बास अंसारी
जिले की दो विस सीट सदर और घोसी बेहद मानी जाती हैं। 2019 में बसपा प्रत्याशी अतुल राय ने भाजपा प्रत्याशी हरिनारायण राजभर को बड़े अंतर से हराया था। शपथ ग्रहण में शामिल होने के बाद सांसद अतुल राय पर एक युवती ने दुष्कर्म का आरोप लगाया था। इसके बाद वह कभी घोसी लोकसभा क्षेत्र में नहीं आ सके। वहीं, सदर विधायक बनने के बाद अब्बास अंसारी भी शपथ लेने के बाद ढाई साल में कभी अपने क्षेत्र में नहीं आ सका।
सदर सीट पर भाजपा नहीं खिला सकी कमल प्रयोग रहे हर बार असफल
मऊ जिले की सदर विधानसभा सीट को बीते ढाई दशक से पूर्वांचल की सबसे हॉट सीट का दर्जा प्राप्त है। 1996 से 2022 तक इस सीट पर बाहुबली मुख्तार अंसारी का कब्जा रहा है। 1980 में भाजपा के अस्तित्व में आने के बाद से अब तक मऊ सदर में कमल नहीं खिला।
चुनावी आंकड़ों को देखें तो भाजपा यहां दूसरे नंबर पर रही है। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन से अल्ताफ अंसारी इस सीट से मैदान में उतरे थे लेकिन उन्हें तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा था। भाजपा-सुहेलदेव पार्टी के गठबंधन प्रत्याशी को दूसरा स्थान मिला था।
इस सीट पर मुख्तार अंसारी के दबदबे की बात करें तो वह 1996 से 2022 तक 5 बार विधायक रहा। मुख्तार अंसारी पहली बार 1996 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट से चुनाव जीता था। 2002 और 2007 में निर्दलीय चुनाव जीतने में सफल रहा। चौथी बार 2012 में कौमी एकता दल के टिकट पर चुनाव लड़कर जीता था।
2017 में उसने बहुजन समाज पार्टी का दामन थामा और मऊ सदर सीट से विजेता बना था। सदर सीट पहले कम्युनिस्ट पार्टी का गढ़ थी। यहां के मतदाताओं ने कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस, जनता पार्टी, बसपा और निर्दल को भी मौका दिया है, लेकिन भाजपा को हमेशा ही निराशा हाथ लगी है।
हालांकि भाजपा कमल खिलाने के लिए कई प्रयोग कर चुकी है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने गठबंधन कर यह सीट सुभासपा को दी थी। भाजपा लहर में गठबंधन प्रत्याशी ने मुख्तार अंसारी को टक्कर तो दी लेकिन जीत नहीं सका।
मुस्लिम बहुल क्षेत्र जीत का बनता है आधार
इस सीट की जीत का सबसे बड़ा आधार मुस्लिम मत होता है। वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार सदर विधानसभा के जातिगत समीकरण में मुस्लिम मतों की संख्या करीब 1.70 लाख है। अनुसूचित जाति 91 हजार, यादव 45 हजार, राजभर 50 हजार तो चौहान मतों की संख्या 45 हजार के करीब है।
क्षत्रिय मतों की संख्या करीब 20 हजार तो ब्राह्मण मत सात हजार के करीब हैं। यहां कुल मतदाताओं की संख्या 4,77,298 है। इसमें पुरुष 251781 जबकि महिला 2,25,487 है।