नोटबंदी के 58 दिन बीतने के बाद भी जिले का प्रमुख साड़ी कारोबार पटरी पर नहीं लौटा है। व्यापार सही न होने के कारण व्यापारी और बुनकर दोनों भुखमरी की कगार पर है। जिससे साड़ी कारोबार पूरी तरह से प्रभवित हो गया है। बुनकरों का कहना है कि नोटबंदी से ज्यादातर लूम बंद हो चुके है। जिससे उनके सामने रोजगार की समस्या उत्पन्न हो गई है।
शहर में करीब 80 हजार लूम हैं। जिनसे उनके पूरे परिवार के सदस्यों का पोषण होता है। ऐसे में नोटबंदी के बाद से कैश की किल्लत से मऊ के साड़ी का व्यापार पूरी तरह से चौपट हो गया है। कैश न मिलने से बड़े व्यापारी लूम चलाने वाले कारीगरों को उनकी मजदूरी नही दें पा रहें हैं। जिससे बुनकरों के सामने भुखमरी की नौबत आ गई है। शहर के हैदरनगर निवासी अख्तर ने बताया कि नोटबंदी के बाद से बुनकरों की हालत काफी खराब है। पहले तो 30 दिसंबर तक किसी तरह से पुराने नोट लेकर काम चला ले रहे थे। मगर जनवरी महीने में स्थिति और खराब हो गई है। अब पैसा मिलना बंद हो गया है। अहमद नगर निवासी इकबाल और पहाड़पुरा निवासी बुनकर मुहम्मद जाहिद ने कहा कि शहर के ज्यादा लूम बंद हो चुकें हैं। क्योंकि सेठ के पास से न तो काम मिल रहा है न ही बकाया पैसा निकल पा रहा है। बड़े व्यापारी नोटबंदी का हवाला दे रहे हैं कि उनके पास भी पैसे नही हैं। ऐसे में अब बुनकरों के परिवार के सामने फांकाकशी की नौबत आ गई है। जैसे तैसे गुजारा हो रहा है। पहाड़पुरा निवासी आबिद अली ने बताया कि बैंक से पैसा निकालने की लिमिट कम होने के चलते भी भुगतान नही मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि नोटबंदी से देश का विकास कहां से होगा, जब बुनकरों के सामने फांकाकशी की नौबत आ गई है। कहा कि पता नही आखिर कब तक इस समस्या का निदान हो पाएगा।