नोटबंदी का असर अब जिले के प्रमुख कारोबार बुनकरी पर भी दिखने लगा है। करीब 60 प्रतिशत लूम बंद होने के कारण प्रतिदिन एक लाख तैयार होने वाली साड़ी के उत्पाद पर नोट बंदी का ग्रहण लग गया। इसका परिणाम है कि बुनकर परिवार बेरोजगार होने लगे हैं।
बतातें चले एक आंकड़े के अनुसार शहर क्षेत्र की आबादी करीब 2.78 लाख है। इसमें से एक लाख लोग बुनकरी से जुड़े हैं। इसके चलते अकेले मऊ शहर में करीब 50 लाख लूम हैं। जो दिन रात चलते है। बुनकर परिवार इन लूमों को चलाकर अपने घर का खर्च चलाता है। बुनकरों के परिश्रम से प्रतिदिन करीब एक लाख साड़ियां तैयार होती थी। इन उत्पाद को भेजने के लिए शहर में प्रतिदिन तीस से चालीस ट्रक लगते थे। लेकिन आठ नवंबर के बाद से यह स्थिति बिगड़ती जा रही है। कारोबार से जुड़े बुनकर अरशद जमाल ने बताया कि नगर क्षेत्र में 25 प्रतिशत बुनकर खुद की साड़ी तैयार कर उसे कारोबारी को बेचते है। जबकि 25 प्रतिशत बुनकर कारोबारी से माल लेकर उससे साड़ी तैयार करते है। लेकिन नोट बंदी के बाद से करेंसी आ नहीं रही। इस कारण कारोबार प्रभावित हो चला है। प्रेमा राय मुहल्ला निवासी बुनकर अबुलैश ने बताया कि उसका कारोबार एक सप्ताह से बंद है। परिवार भुखमरी के कगार पर पहुंच चुका है। बोले महाजन से उधार आदि लेकर काम चलाया जा रहा है। इसीक्रम मे क्यारीटोला मुहल्ला निवासी शमीम अहमद ने बताया कि दस वर्षो से बुनकरी का कारोबार बैठा था। इस वर्ष बाजार और बिजली दोनों अच्छी मिल रही थी। लेकिन नोटबंदी ने सब चौपट कर दिया। साड़ी के आढतियां साजिद अनवर ने बताया कि उनके गोदाम में माल डंफ पड़ा है। कारण न आर्डर आ रहा है, ना ही माल की सप्लाई की जा रही। इसीक्रम में आढती के कारोबारी इकबाल चंदेरी ने बताया कि नोट बंदी के कुछ दिनों तक तो ठीक रहा। लेकिन बाद में आर्डर मिलना तो दूर जो आर्डर पहले से थे वो भी कैंसिल हो गए। ऐसे में कारोबार और बुनकर दोनों बैठे हुए हैं।