मऊ। 20 साल तक घोसी से प्रतिनिधित्व से दूर रखने के बाद बीते दो लोकसभा चुनाव से लोगों की पसंद सवर्ण बिरादरी रही है। जहां दो दशक के लंबे अंतराल के बाद 2019 में सपा-बसपा गठबंधन प्रत्याशी अतुल राय को जनता ने भारी मतों से जिताया था, वहीं 2024 में सपा गठबंधन प्रत्याशी राजीव राय ने बड़ी जीत हासिल की। बीते दो चुनावों की देखें तो भाजपा ने राजभर प्रत्याशी पर दांव लगाया, तो वहीं सपा गठबंधन ने दोनों बार भूमिहार बिरादरी पर दांव लगाने को प्राथमिकता दी। 2024 में दूसरी बार भी घोसी की जनता ने भूमिहार प्रत्याशी को संसद में भेजने का फैसला किया। आजादी के बाद लगातार 40 सालों तक घोसी संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व करने वाली भूमिहार बिरादरी के नेता इधर के सालों में सीट पर अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे थे। जहां कल्पनाथ राय के निधन के बाद से हाल के 20 सालों से इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व ओबीसी प्रत्याशी के हाथ में रहा था। लेकिन 2019 में सपा-बसपा गठबंधन के तौर पर प्रत्याशी अतुल राय ने डेढ़ लाख से ज्यादा मतों से जीत हासिल कर ओबीसी प्रत्याशियों का वर्चस्व तोड़ने में कामयाब रहे। वहीं 2024 में यह सपा गठबंधन प्रत्याशी राजीव राय ने यह रिकॉर्ड कायम रखा। ध्यान देने वाली बात है कि दोनों बीते चुनावों में भाजपा ने जहां 2019 में हरीनरायण राजभर को उम्मीदवार बनाया, वहीं 2024 में भाजपा ने गठबंधन प्रत्याशी डॉ. अरविंद राजभर केा उम्मीदवार बनाया। इसके पीछे
जातीय अंकगणित थी। इसको देखते हुए ही भाजपा भी इधर कई बार से पिछड़े समुदाय से आने वाले नेताओं को टिकट दे रही थी।
18 में 14 बार चुने गए भूमिहार सांसद
मऊ-मुहम्मदाबाद गोहना। आजादी के बाद 1951 से 2024 तक हुए लोकसभा चुनाव में घोसी क्षेत्र से सबसे अधिक 14 बार भूमिहार जाति के प्रत्याशियों को सफलता मिली है। 1951 से पहले चुनाव से लेकर 1998 तक में 1957 को छोड़कर सभी चुनाव में भूमिहार सांसद बनें। लेकिन पूर्वांचल के दिग्गज नेता कहे जाने वाले कल्पनाथ राय की 1999 में मृत्यु के बाद मऊ में भूमिहारों की राजनीति हाशिए पर पहुंच गई है। टिकट देने के मामले में राजनीति दलों द्वारा भूमिहारों की उपेक्षा और आपसी तालमेल का अभाव के चलते हाशिए पर चली गई। भूमिहारों की राजनीति अब राजीव राय की जीत के बाद लगातार दूसरी बार भूमिहार जीतने से एक बार फिर से वर्चस्व कायम करने में सफल हुई है। आजादी के बाद 1951 से 1998 तक के चुनाव में एक बार को छोड़कर सभी चुनाव में भूमिहार ही सांसद चुने गए। 1951में सबसे पहले अलगू राय ने यहां से जीत हासिल कर पहला सांसद होने का गौरव प्राप्त किया। इसके बाद 1957 के दूसरे लोकसभा चुनाव में गैर भूमिहार उमराव सिंह सांसद बने। 1962 में हुए तीसरे और 1967 में चौथी लोकसभा के लिए भूमिहार जाति के जयबहादुर सिंह सांसद चुने गए। 1968 में लोकसभा का उपचुनाव हुआ जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी के झारखंडे राय ने जीत हासिल की। इसके बाद 1971 में हुए आम लोकसभा चुनाव में भी झारखंडे राय ने जीत का सिलसिला कायम रखा । 1977 के लोकसभा चुनाव में घोसी क्षेत्र से जनता पार्टी प्रत्याशी के रूप में शिवराम राय ने परचम फहराया। जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद 1980 में एक बार फिर पूरे देश में आम चुनाव हुआ। इसमें झारखंडे राय ने सीपीआई प्रत्याशी के रूप में तीसरी बार झंडा बुलंद किया। 1984 में इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद पूरे देश में एक साथ लोकसभा का चुनाव हुआ। इस बार यहां से कांग्रेस के राजकुमार राय ने जीत दर्ज की। पांच साल बाद 1989 में चुनाव हुआ तो कांग्रेस के कल्पनाथ राय पहली बार यह से सांसद बने। इसके बाद वह लगातार विभिन्न पार्टियों और निर्दल चुनाव लड़कर तीन बार 1991, 96 और 98 के चुनाव में घोसी से सांसद चुने गए। 1999 में उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद ही भूमिहार बिरादरी का वर्चस्व समाप्त हो गया। 2004 से लेकर 2014 तक तीन चुनाव में विभिन्न पार्टियों से भूमिहार जाति के प्रत्याशी लोकसभा का चुनाव लड़े लेकिन सफलता नहीं मिली। 2019 में अतुल राय के बाद 2024 मे भी भूमिहार बिरादरी के राजीव राय की जीत ने एक बार फिर से भूमिहार बिरादरी का वर्चस्व कायम किया है।