आजादी की पहली क्रांति 1857 में ही जनपद का मधुबन क्षेत्र ब्रिटिश हुकूमत से आजाद हो गया था। यहां के क्रांतिकारियों ने कलेक्टर बेनी बुल्स को गोली मार दी और कलेक्ट्रेट और कचहरी पर कब्जा कर लिया। आजादी के 90 साल पहले तीन जून 1857 को ही इस प्रकार 22 दिन के लिए क्षेत्र आजाद रहा। कलेक्टर को गोली मारने के बाद ब्रिटिश संसद में भी सनसनी फैल गई थी।
हालांकि इस घटना के बाद क्रांतिकारियों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले हरख और हुलास सिंह को सरेआम फांसी देकर अंग्रेजों ने फिर से जिले पर अपना आधिपत्य जमा लिया। 1857 के इस घटना के बाद अंग्रेजों ने फिर से भले ही कब्जा जमा लिया, लेकिन यहां के क्रांतिकारियों का हौसला कम नहीं हुआ।
अंग्रेजों ने पूर्व की घटना के बाद यहां के आजादी के दीवानों पर काफी जुल्म किए। बीच में कई ऐतिहासिक लड़ाई लड़ते हुए यह आग 15 अगस्त 1942 को फिर से इतिहास दोहराने के लिए धधकने लगी। क्रांतिकारी सरकारी दफ्तरों पर कब्जा करने के लिए तैयारी में थे।
इसकी जानकारी जब कलेक्टर मि. निबलेट को हुई तो वह 15 अगस्त के दिन मधुबन थाने पर जा पहुंचे। मधुबन क्षेत्र के आसपास सहित जनपद के विभिन्न स्थानों के क्रांतिकारी जगह-जगह सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाते हुए मधुबन थाने पर कब्जा करने के लिए जा पहुंचे।
अपनी योजना के अनुसार क्रांतिकारी हजारों की संख्या में डाकखाना लूटते हुए एवं जगह-जगह तोडफ़ोड़ करते देखकर थाने पर जा पहुंचे। यह देख कलेक्टर मि. निबलेट और अन्य अधिकारी बौखला उठे।
25 अगस्त 1942 को अंग्रेजों ने मधुबन थाने पर 149 राउंड गोलियां चलवाई। इसमें 35 क्रांतिकारी शहीद हो गए, जबकि दर्जनों घायल हो गए। इस घटना के बाद खुरहट, अमिला, दोहरीघाट, घोसी सहित पूरे जिले में क्रांतिकारियों ने तोडफ़ोड़, आगजनी, ट्रेन में अंग्रेजी संपत्ति की लूट की और अंतत: आजादी प्राप्त की।
आजादी की इस लड़ाई में जिले के क्रांतिकारियों के योगदान को पहली क्रांति से लेकर आजादी प्राप्त करने तक भुलाया नहीं जा सकता। इसमें जयबहादुर सिंह, झारखंडे राय, पं. रामविलास पांडेय, अलगू राय शास्त्री आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।