मऊ। नगर क्षेत्र में रविवार की रात मुहर्रम के दसवीं का जुलूस परंपरागत तरीके से निकाला गया। इस दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। परंपरा के अनुसार जलुस संस्कृत पाठशाला पहुंचकर दो सीढी चढकर आगे बढी।
मलिक टोला में 10 मोहर्रम का जुलूस मलिक टोला इमामबाड़े से निकलकर अपने क़दीमी रास्ते शाही कटरा औरंगाबाद होते हुए कर्बला पहुंचा। जुलूस में लोगों ने जंजीर और कमा का मातम किया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम दूसरी मुहर्रम को कर्बला पहुंचे।यजीद नामक व्यक्ति जो अपनी दौलत और शोहरत पर नाज रखता था, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से उसने बयत करने की कोशिश की। इमाम हुसैन ने उसके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया क्योंकि एक तरफ दीन था और एक तरफ का मजहब इंसान था।यजीद ने सोचा अगर इमाम हुसैन हमसे बैयत कर लेते हैं तो हम वही करेंगे जो हम चाहते हैं। इमाम हुसैन ने जब यह देखा कि तीन दिन इस्लाम खतरे में है तो उन्होंने यजीद के बैयत को ठुकरा दिया और अपने 72 साथियों के साथ कर्बला में अपनी कुर्बानी देकर दुनिया तक संदेश दिया कि सबसे सबसे बड़ी चीज मानवता है उसी इंसानियत को इमाम हुसैन ने बचाने के लिए अपने पूरे परिवार को कर्बला में शहादत देकर इस्लाम को कुरान को पैगंबर सल्ला वसल्लम को बचा लिया। यजीद ने जंग का एलान किया और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को बेटे भतीजे को बारी-बारी करके जंग के लिए भेजते थे और सब शहीद हो जाते थे ।एक वक्त ऐसा भी आया जब उनके यहां कोई भी शख्स मौजूद नहीं था सिर्फ 6 महीने का एक बच्चा था। उसको जंग के मैदान में ले गए और यजीद से कहा कि अगर मैं गुनहगार हूं तो ये मासूम बच्चा तो कोई गुनाह नहीं किया है इसको आप दो कतरा पानी तो पिला दो मगर यजीद मलून ने उस छह माह के बच्चे को भी तीरों से छलनी कर दिया ।आखिरी वक्त असरे आशूर जंग के मैदान में पहुंचे और यजीदी फौजों से जंग की। मगर लाखों लश्कर में इमाम हुसैन को जब घेर लिया तो इमाम हुसैन ने आखिरी सजदा किया उसी वक्त शिम्र ने इमाम हुसैन की गर्दन पर खंजरों से वार कर उन्हें शहीद कर दिया और फिर चारों तरफ से तीरों की बौछार कर दी। उसी इमाम हुसैन की याद में ग़म मनाते हैं। अंजुमन बाबुल इल्म जाफ़रिया ने नौहाख्वानी पेश की और फिर जंजीर और कमा का मातम किया। इसमें मुख्य रूप से तजियेदार सैयद अली असर, इरफान अली, रिजवी, मासूम, हैदर, मकसूद, जावेद आदि लोग मौजूद रहे।