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महात्मा गांधी से मिलकर विद्याधर त्रिपाठी ने पकड़ी आंदोलन की राह

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मधुबन। जन जन में आजादी का जोश व जज्बा भरने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित विद्याधर त्रिपाठी का नाम आजादी की लड़ाई में प्रमुख है। मधुबन तहसील के एक छोटे से गांव मखमेलपुर में श्री त्रिपाठी का जन्म हुआ था।शिक्षा के समय में ही आजादी का जज्बा उनके रग रग में समा गया था।आजादी के आंदोलन से लेकर अति पिछड़े क्षेत्रो में शिक्षा की अलख जगाने वाले विद्याधर त्रिपाठी का जीवन भारी कठिनाइयों के बीच गुजरा। गांधी जी की एक ही मुलाकात ने विद्याधर त्रिपाठी का जीवन बदल दिया और वह खुद गांधीवादी ढंग से आंदोलन में जुटकर देश को आजाद कराने को लेकर लग गए। मोटी खादी की धोती बनियान और कुर्ता के साथ पैरो में टायर से तैयार चप्पल ही श्री त्रिपाठी की पहचान व पहनावा था। उन्होंने आजाद भारत में भी आसाम के चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों और उनके हक तथा हितों की आजीवन लड़ाई लड़ते रहे। गत वर्ष उन्होंने 100 वर्ष की अवस्था में इस दुनिया को अलविदा कहा।
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थाना क्षेत्र अंतर्गत केशोपुर सुल्तानीपुर के मखमेलपुर पुरवे में 1916 में पंडित विद्याधर त्रिपाठी का जन्म हुआ था।श्री त्रिपाठी आपस में दो भाई थे।देश में अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा था। उस समय विद्याधर त्रिपाठी काशी विद्यापीठ वाराणसी में हिंदी और संस्कृत की शिक्षा ले रहे थे। गांधी जी का सत्याग्रह आंदोलन चरम पर था।वह अपने साथियों के साथ बनारस में आकर आंदोलनकारियों में अंग्रेजों की दमनकारी नीति के खिलाफ आंदोलन करने की हुंकार भर रहे थे।उस बैठक में विद्याधर त्रिपाठी भी शामिल थे।उस बैठक का विद्याधर त्रिपाठी पर ऐसा असर हुआ कि वह पढ़ाई छोड़कर सत्याग्रह आंदोलन में शरीक हो गए।1936 से लेकर 1938 तक वे सत्याग्रह आंदोलन को बनारस एवं आसपास के क्षेत्रो में धार देते रहे।इस बीच उन्हें कई बार अंग्रेजी हुकूमत के सिपाहियों की यातना व जेल की दुर्दशा से जूझना पड़ा।लेकिन उनके अडिग देश प्रेम और विश्वास को अंग्रेजी हुकूमत के नुमाइंदे तोड़ नही सके।श्री त्रिपाठी दिघेड़ा निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी झिनक सिंह और कुबेरनाथ पांडेय के साथ 1942 के मधुबन थाने पर तिरंगा फहराने वाले आंदोलन में भी भाग लिया। मझवारा सेमरी से लेकर मधुबन तक क्रांतिकारियों का पूरा जत्था विद्याधर त्रिपाठी के साथ अंग्रेजो द्वारा लगाए गए बैरिकेटिंग आदि को तोड़ते हुए थाने पर पहुंचे। जहां पूरे क्षेत्र से सैकड़ों की संख्या में आजादी के दीवाने पहुंचकर गगनभेदी नारे लगा रहे थे।अंग्रेजो भारत छोड़ो,इंकलाब जिंदाबाद के नारों से पुरा इलाका दहल उठा।इसके बाद जब भींड़ बेकाबू हुई तो कलेक्टर निबलेट के आदेश पर 149 राउंड गोलियां भारतीयों पर चलाई गई।दर्जनों मौते हुई लेकिन एक भी क्रान्तिकारी पीछे हटने को तैयार नही था।चारो तरफ लाशें व क्रांतिकारियों की चीखें खून से लथपथ शरीर ही दिखाई देते थे।अंधेरे का फायदा उठकरलोग अपने परिजनों को तलाश कर किसी तरह लेकर दवा इलाज कराया। इसके बाद तो अंग्रेज सिपाहियों ने क्षेत्र के सभी बड़े क्रांतिकारियों के घरों को निशाना बनाकर लूटपाट करते और घर जल देते।अंग्रेज सिपाहियों की बर्बरता देख विद्याधर त्रिपाठी गांव छोड़ दिये और गरीब दलित बस्तियों में जाकर उन्हें जागरुक कर आजादी की अलख जलाने लगे।
आजादी के बाद श्री त्रिपाठी राष्ट्रीय नेताओं से प्रेरित होकर आसाम पश्चिम बंगाल, बांग्लाझ् देश सहित कई प्रदेशों में उन्होंने गरीब दलित असहाय लोंगो को शिक्षित करने को ही अपना उद्देश्य बनाया।इसके बाद वह सिल्हर चले गए और श्रम संगठनों की गतिविधियों में शामिल होकर मजदूरों की लड़ाई लड़े और उनका हक दिलाया।उन्होंने सोनारवीरा के बाद अकाइदुम के घने जंगलों में अपना आशियाना बनाकर उसका नाम गांधीनगर रखा।धीरे धीरे उन्होंने वहां लोंगो के सहयोग से एक स्कुल की स्थापना की जिसमें उस क्षेत्र के निर्धन और असहाय बच्चों को तालीम देना शुरू किया।धीरे धीरे उस क्षेत्र में श्री त्रिपाठी के प्रयास रंग लाये।इस तरह उन्होंने देश के पूर्वी अति पिछड़े क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाकर अपना जीवन तो यादगार बनाया ही साथ ही लोंगो के दिलो पर राज करने लगे।वो जिस रास्ते पर गांधी झोला पैरों में टायर के चप्पल सिर पर गांधी टोपी पहनकर सड़क पर निकलते थे तो लोग उन्हें आजादी के बाद का गांधी कह कर उनका सम्मान करते नही थकते थे।आज भी वहां नेहरू विद्यापीठ के नाम से विद्यालय संचालित है।यही उनके जीवन का मकसद था।कोई संतान नही होने के कारण उन्होंने अपने भाई सूर्यकान्त त्रिपाठी के लड़के को गोद लिया था।उनके द्वारा खोले गए सभी स्कुल संस्थान सरकार के अधीन है।
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नहीं मिली असली आजादी
मधुबन(ब्यूरो)पंडित विद्याधर त्रिपाठी के दत्तक पुत्र आकाश त्रिपाठी बताते है कि आजाद भारत मे भी पंडित जी गरीबों की सेवा में ही लगे रहे। घर तक कि सुधि नही लेते थे।लेकिन सरकारों ने भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों व उनके परिवारों के लिए कोई भी ठोस कदम नही उठाया।कोई सुविधा नही दी गई। कल और आज में बस इतना ही फर्क है कि उस समय हम गुलाम थे आज आजाद है लेकिन वह आजादी किस काम की जो किसी के काम न आ सके। पहले अंग्रेज देश को लूटते थे अब देश के भीतर बैठे काले अंग्रेज देश को लूट रहे है। भ्रष्टाचार रूपी दीमक भारत को खाये जा रहा है। इससे उबरने पर ही देश के लोंगो को असली आजादी मिलेगी।
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