मऊ। सीएमओ कार्यालय के सभागार में मंगलवार को राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जन्मजात दोषों की पहचान, नवजात शिशु देखभाल विषय पर कार्यशाला आयोजित हुई। जिसमें जिला महिला चिकित्सालय एवं ब्लाकों से प्रसव इकाइयों पर कार्यरत एक चिकित्साधिकारी एवं 2 स्टाफ नर्सो ने प्रशिक्षण में प्रतिभाग किया। मास्टर ट्रेनर द्वारा शिशु मृत्यु दर में कमी लाने हेतु आवश्यक प्रयास के बारे में जानकारी दी गई।
शुभारंभ सीएमओ डा. सतीशचंद्र सिंह, अपर सीएमओ पीके राय और नोडल अधिकारी डॉ.एम. लाल ने किया। सीएमओ ने कहा कि बच्चे की उत्तरजीविता के लिए नवजात काल की अवधि (जीवन के पहले 28 दिन) महत्वपूर्ण होते है, क्योंकि इस अवधि में बाल्यवस्था के दौरान किसी अन्य अवधि की तुलना में प्रतिदिन मृत्यु का जोखिम अधिक होता है। आजीवन स्वास्थ्य और विकास के लिए जीवन का पहला महीना आधारभूत अवधि है। स्वस्थ शिशु स्वस्थ वयस्कों में विकसित होते है, जो कि अपने समुदायों और समाजों की उन्नति एवं विकास में योगदान करते हैं। बताया कि प्रतिवर्ष 26 लाख बच्चे जीवन के पहले 28 दिन यानि कि सबसे पहले सप्ताह में मृत्यु को प्राप्त हो जाते है।
इसके अतिरिक्त प्रतिवर्ष 2.6 मिलियन बच्चे मृत जन्म लेते हैं। देश में 2013 में 0.75 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु हुयी, हालांकि नवजात शिशु मृत्यु दर (एनएमआर) वर्ष 2000 में प्रति 1000 जीवित जन्मों में 44 से घटकर वर्ष 2013 में प्रति 1000 जीवित जन्मों में 28 की गिरावट आयी है। यदि हम वर्ष 2035 तक पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों की मृत्यु दर 1000 जन्में बच्चों में 20 या उससे कम करना चाहते है, तो हमें नवजात मृत्यु दर को कम करने के लिए विशिष्ट प्रयास करने होंगे। कार्यशाला में प्रशिक्षक अरविंद कुमार वर्मा, डा. कंचनलता, डा. अंजुम, डा. शैलजाकांत पांडेय, आंती सिंह, सारिका राय, ममता, दुर्गाप्रताप सिंह आदि उपस्थित रहे।