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जानकारी के अभाव में गंवा बैठते हैं जान

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मऊ। टीबी के मरीज को उसके घर पर समुचित तरीके से नियमित रूप से दवा खिलाने की जिम्मेदारी गांव की आशाओं को दी गई है। इन्हें अपने सामने ही मरीज को प्रतिदिन दवा खिलाने ,उनकी नियमित जांच कराने का दायित्व दिया गया है। लेकिन जानकारी के अभाव तथा रोग छिपाने की नियति से टीबी के मरीज प्राइवेट चिकित्सकों के पास इलाज कराने पहुंच जाते हैं। गरीब मरीज महंगी दवाइयां खरीदकर नियमित रूप से पूरे कोर्स तक नहीं खा पाते हैं। जब उनकी बीमारी अंतिम दौर में पहुंच जाती है तब सरकारी अस्पताल पहुंचते हैं लेकिन तब तक ऐसे गंभीर मरीजों का इलाज मुश्किल हो जाता है और उनकी मौत हो जाती है। जिले में बीते एक साल में ऐसे ही 32 गंभीर मरीजों की मौत हो चुकी है जो समय से नियमित रूप से टीबी का इलाज नहीं कर सके। जिले में टीबी के मरीजों के लिए 460 डाट्स् केंद्र खोले गए हैं। टीबी के संभावित रोगियों के बलगम की जांच के लिए कुल 21 जांच केंद्र बनाए गए हैं। जांच केंद्रों से बलगम की जांच कराने पर टीबी के लक्षण मिलते ही मरीजों के कार्ड बना दिए जाते हैं। मरीज के निकटवर्ती अस्पताल अथवा डाट्स केंद्र के माध्यम से उसे एक महीने की दवा मरीज के गांव अथवा शहरी क्षेत्र की आशा को दे दी जाती है। जो प्रतिदिन मरीज को दवा की पूरी खुराक नियमित तरीके से अपने सामने उसके घर जाकर खिलाती है।
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टीबी के मरीजों की जांच के लिए सबसे महत्वपूर्ण जांच सीबीनाट होती है। यह पहले वाराणसी में होती थी। बाद में गाजीपुर में यह सुविधा सुलभ हुई लेकिन अब साल भर से जिला मुख्यालय स्थित टीबी क्लीनिक पर यह सुविधा उपलब्ध है। इस जांच से यह पता चलता है कि रोगी के शरीर में टीबी किस स्तर तक पहुंच चुकी है और उस आधार पर उसे दवा दी जाती है।
एमडीआर यानी मल्टी ड्रग रेजिटेंस श्रेणी के जिले में 75 रोगी इस समय चिह्नित किए गए हैं जबकि एक्सडीआर श्रेणी के दस मरीज चिह्नित किए गए हैं। इनके अलावा विभिन्न सरकारी डाट्स केंद्रों से नियमित इलाज कराने वाले पंजीकृत मरीजों की संख्या 410 है। इनके अलावा कुछ ऐसे भी मरीज हैं जो जानकारी के अभाव अथवा रोग छिपाने के उद्देश्य से सरकारी अस्पतालों डाट्स केंद्रों में नहीं जाकर प्राइवेट चिकित्सकों के पास चले जाते हैं। उनका इलाज काफी मंहगा होने के चलते पूरे कोर्स की दवाइयां खा नहीं पाते और रोग के शिकार हो जाते हैं।
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