एक मार्च, 2013 की पदयात्रा में जनसमंदर के बीच कभी जोशीले तो कभी मतवाले अंदाज में नाचते-गाते संत जयकृष्णदास दो साल बाद तनहा नजर आए। जनसैलाब उमड़ने के दावे का गोविंद मठ में जो हश्र हुआ उससे उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। बहुप्रचारित यात्रा में गिनती के चार वाहन पूरे 26 घंटे विलंब से पहुंचे और दो दर्जन लोग उसमें यमुना के जयकारे लगाकर रवानगी की रस्म अदा कर गए। अपने गुरु संत रमेश बाबा से अलग जमीन तैयार करने चले जयकृष्णदास की जमीन पूरी तरह इस बहुप्रचारित आंदोलन में खिसक गई। बारंबार माथे से पसीना पोंछते दास खुद के अर्श से फर्श पर पहुंचने के साक्षी बन गए।
इलाहाबाद, वाराणसी से लेकर दिल्ली और इटावा तक संपर्क साधकर लाखों लोगों की भीड़ जुटने के दावे की परत छटीकरा मैदान में बुधवार की सुबह ही खुल गई। मैदान सूना रहा तो जयकृष्णदास ने मुख्यमंत्री के आगमन के बहाने बार-बार यात्रा का समय बदलते हुए इसे गुरुवार सुबह सात बजे कर दिया। सुबह वृंदावन के गोविंद मठ में अखबार के पन्ने पलटते हुए संत जयकृष्णदास बार-बार मोबाइल से अपने रणनीतिकारों से भीड़ के बारे में पूछते नजर आए। डेढ़ घंटे में दस लोग भी गोविंद मठ नहीं पहुंच सके।
लगभग नौ बजे यहां चार गाड़ियों में सवार होने के लिए बमुश्किल बीस लोग पाए गए। सन्नाटे का यह बड़ा सदमा था जिसमें यमुना रक्षक दल के गुब्बारे की हवा निकल चुकी थी। कैमरे से बचते तो कभी घबराए नजर आते जयकृष्णदास और उनके समर्थक को यकीन ही नहीं था कि उन्हें यह दिन भी देखना पड़ेगा। चिंता स्वाभाविक थी क्योंकि दास और उनके चंद समर्थक दो बरस पहले जनसमंदर की लहर पर सवार होकर नाचते-गाते चल रहे थे।
कमजोर बुनियाद पर खड़ा था किला
यमुना रक्षक दल की बुनियाद उसी दिन खिसक गई थी जिस दिन संत जयकृष्णदास के रास्ते ब्रज के विरक्त संत रमेश बाबा से अलग हो गए थे। गुरु की छाया से निकलकर यमुना आंदोलन को देशभर में फैलाने का दावा करने वाले दास से एक-एक कर सभी लोग अलग होते गए। गोकुल के पंकज बाबा के अलग होते ही गुजराती समाज उनसे छिटक गया जो पिछले आंदोलन का हिस्सा था।
भाकियू भानु गुट के भानु प्रताप सिंह ने भी निष्ठा संत रमेश बाबा के साथ दिखाई तो सीधे-सीधे 10 हजार से अधिक किसानों ने उनसे नाता तोड़ लिया। चतुर्वेदी समाज भी जयकृष्ण दास से अलग हो गया। यह समाज अब संत रमेश बाबा के यमुना मुक्तिकरण अभियान में सक्रिय दिख रहा है।
राजनीतिज्ञों का भी भ्रम टूटा
यमुना रक्षक दल ही वर्ष 2013 के आंदोलन का बैनर था। इसके अध्यक्ष होने के नाते संत जयकृष्णदास को लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के नेता पहचानने लगे। ब्रज में जमीन खिसकते देख संत जयकृष्णदास कभी मुलायम सिंह यादव की पुत्रवधू अपर्णा तो कभी सांसद दर्शन सिंह यादव से संपर्क करते नजर आए।
दिल्ली जाकर भी उमा भारती से लेकर अन्य सांसदों तक से उन्होंने पिछले आंदोलन की दुहाई देकर समर्थन मांगा लेकिन बुधवार को ही जब उनकी यात्रा टली तो राजनीतिज्ञों का भी भ्रम टूट गया। राजनीति से लेकर विभिन्न समाज तक कोई भी बड़ा चेहरा इस बार उनके साथ नजर नहीं आया।