वृंदावन (मथुरा)। गीता भगवान का योग शास्त्र है और रामायण प्रयोग शास्त्र है। वस्तुत: भगवान श्रीराम एवं भगवान श्रीकृष्ण में कोई भी भेद नहीं है। जो भेद करते हैं, वास्तव में दंड के पात्र हैं। यह उद्गार श्रीमलूकपीठ सेवा संस्थान न्यास में चल रहे द्वाराचार्य जगद्गुरु श्री मलूकदास जी महाराज के जयंती महोत्सव में श्रीचित्रकूट तुलसी पीठाधीश्वर स्वामी रामभद्राचार्य देवाचार्य ने व्यास पीठ से व्यक्त किए। कहा कि प्रसिद्ध श्रीबांकेबिहारी मंदिर में नहीं जाएंगे, जब तक कि मां यमुना अविरल एवं निर्मल नहीं हो जातीं और श्रीकृष्ण जन्मभूमि पूर्ण रूप से मुक्त नहीं हो जाती।
उन्होंने कहा कि यह भी भ्रम फैलाया जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण 16 कलायुक्त पूर्णावतार थे और भगवान श्रीराम 14 कलायुक्त अंशावतार जो कि पूर्णतया: निराधार है। वास्तव में प्रभु श्रीराम एवं प्रभु श्रीकृष्ण दोनों ही संपूर्ण 16 कलाओं से परिपूर्ण पूर्णावतार हैं। उन्होंने यह चुनौती देते हुए कहा कि यदि कोई भी यह साबित कर दे कि दोनों अवतारों में कलाओं का भेद था, तो वे अपने त्रिदंड को यहीं वृंदावन में ही यमुना नदी में प्रवाहित कर देंगे।
इसके अतिरिक्त उन्होंने व्यास पीठ से यह संकल्प भी दोहराया कि वे वृंदावन तो आए हैं लेकिन यहां के प्रसिद्ध श्रीबांकेबिहारी मंदिर तभी जाएंगे जब मां यमुना निर्मल और श्रीकृष्ण जन्मभूमि पूर्ण रूप से मुक्त हो जाएगी। इस अवसर पर मलूक पीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्र दास देवाचार्य महाराज, तुलसी पीठ युवराज स्वामी रामचंद्र दास, संत रसिक माधव दास, संत फूलडोल दास महाराज, गंगा दास महाराज, गोपेश कृष्ण दास, संत रसराज, प्रवीण मलूक पीठ के प्रवक्ता देव द्विवेदी थे।