फोगला आश्रम में संविधानिक एवं संसदीय अध्ययन संस्थान द्वारा फोगला आश्रम में आयोजित स्वस्थ सामाजिक परिवेश के निर्माण में महिलाओं का योगदान विषयक संगोष्ठी का बुधवार को समापन हो गया। समापन सत्र को संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति गणेश शंकर पांडेय ने कहा कि हमारी भारतीय परंपरा में मां सरस्वती, मां लक्ष्मी और मां दुर्गा के रूपों में महिला शक्ति की पूजा होती रही है। यह श्रद्धा जितनी पारंपरिक है उतनी ही प्रामाणिक भी। वैदिक युग में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता में जो मूर्तियां मिलीं उनमें अधिकांश दैव रूप में स्त्री प्रतीकों का प्रतिनिधित्व करने वाली थीं।
उन्होंने कहा कि सामाजिक विकास के योगदान में भी स्त्रियों की नैतिक एवं महती भूमिका रही है। हमारा इतिहास संस्कृति और पुराण सभी स्त्रियों की गौरवमयी गाथाओं से परिपूर्ण हैं। रामायण काल में सीता ने त्याग और बलिदान की शिक्षा दी, वहीं द्रोपदी ने महाभारत काल में युधिष्ठिर और भीम को व्यवहार नैतिकता की शिक्षा दी, इसीलिए द्रोपदी को पंडिता कहा गया। उन्होंने कहा कि भक्ति मार्ग में मीराबाई, सुकूबाई, मुक्ताबाई ने संतों में स्थान प्राप्त किया। मध्यकाल में विदेशी आक्रमणों ने भारत में महिला की स्थिति को दुर्दशापूर्ण बना दिया, जिसे 19वीं सदी में समाज सुधारकों के नवजागरण ने पुन: सुधार की ओर अग्रसर किया।
इसी काल में विधवा विवाह को बल मिला और सती प्रथा, पर्दा प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के दमन के प्रति आवाज उठी। भगिनी निवेदिता, सरला देवी चौधरी, मेडम भीकाजी कामा और एनी बेसेंट ने रूढ़िवाद और अंधविश्वास के खिलाफ सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया। उन्होंने कहा कि जीवन में मां के रूप में महिला पहली गुरु होती है। संवेदना, संस्कार, समर्पण और सद्व्यवहार इसी मां की देन के रूप में भारतीय परंपरा के पुंज को प्रकाशमान करता रहता है।
प्रमुख सचिव नरेंद्र कुमार चौबे ने कहा कि यह विचार गोष्ठी मात्र औपचारिकता का केंद्र न होकर संस्कारवान भारत के निर्माण में महिलाओं की भूमिका के प्रति समर्पित है। इस अवसर पर सदस्य संस्थान विजय आचार्य, महेश आर्य, विजय यादव, सुभाष मिश्रा, सेवकराम, विशाल वर्मा, कैलाश यादव, कमलेश त्रिपाठी, विश्राम सिंह यादव, राजबहादुर सिंह, बीना दुग्गल, प्रमोद कुमार मिश्रा, पंडित उदयन शर्मा आदि उपस्थित थे।