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बरसाना-वृंदावन आने पर कहिए लाडलीजी ने बुलाया है : प्रदीप मिश्रा

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बरसाना। मैं इतनी बार बरसाना आ चुका हूं, मैं इतनी बार वृंदावन जा चुका हूं, यह कहकर ब्रज में भक्ति का बखान मत कीजिए। कहिए कि लाडली राधारानी ने बुलाया, तभी ब्रज आने का सौभाग्य मिला। शिव महापुराण कथा के विराम दिवस पर कथा व्यास पंडित प्रदीप मिश्रा ने श्रद्धालुओं को भक्ति में अहंकार से बचने का संदेश देते हुए कहा कि ब्रज आना किसी की उपलब्धि नहीं, राधारानी की कृपा है।
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कथा के दौरान गुरु वंदना के साथ हर हर महादेव और जय जय श्री राधे के जयकारों से वातावरण भक्तिमय बना रहा। पंडित प्रदीप मिश्रा ने पर्वत मुनि के प्रसंग के जरिए समझाया कि भगवान के दर्शन, तीर्थ यात्रा या भक्ति को अपनी उपलब्धि मान लेना अहंकार है। उन्होंने कहा कि ब्रज में कितनी बार आए, इसकी गिनती करने के बजाय हर बार यह भाव रखना चाहिए कि राधारानी ने बुलाया, तभी उनके धाम में आने का अवसर मिला। कथा में तारकासुर और कार्तिकेय का प्रसंग सुनाते हुए पंडित प्रदीप मिश्रा ने सात दिन के महत्व को समझाया। उन्होंने बताया कि तारकासुर को वरदान था कि उसका वध शिव के सात दिन के पुत्र के हाथों होगा। इसी प्रसंग को उन्होंने मनुष्य के जीवन से जोड़ते हुए कहा कि जीवन भी सात दिनों के क्रम में चलता है। मनुष्य किसी एक दिन जन्म लेता है और किसी एक दिन इस संसार से विदा होता है।

उन्होंने सात अंक को गोवर्धन से भी जोड़ा। कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को सात दिन धारण किया। भागवत कथा सात दिन की होती है और शिव महापुराण कथा भी सात दिन में पूरी होती है। सात दिन के कार्तिकेय को माता पार्वती द्वारा शिव तत्व का ज्ञान दिए जाने के प्रसंग से उन्होंने गुरु और संस्कार की महत्ता समझाई।
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मंत्र दीक्षा से पहले नाम का संस्कार

पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि बच्चे के जीवन में संस्कार जन्म से ही शुरू हो जाते हैं। मां उसका पहला गुरु है, पिता दूसरा, शिक्षक तीसरा और सद्गुरु चौथा गुरु होता है। उन्होंने माताओं से कहा कि वे बच्चे के कान में जन्म से ही अपने आराध्य का नाम डालें। शिव, राम, कृष्ण या जिस देवता में परिवार की आस्था हो, उसी नाम का संस्कार बच्चे को बचपन से दिया जाए। कथा में मंत्र दीक्षा और नाम दीक्षा का अंतर भी समझाया गया। उन्होंने कहा कि केवल धार्मिक पहचान पर्याप्त नहीं, जीवन में आराध्य के नाम और गुरु से मिले संस्कार को उतारना जरूरी है। मां के माध्यम से बच्चे तक पहुंचा आराध्य का नाम उसके जीवन की पहली आध्यात्मिक शिक्षा बन सकता है।

ब्रज में आने का भाव बदलने का संदेश

कथा व्यास ने श्रद्धालुओं से कहा कि बरसाना या वृंदावन आने को अपनी भक्ति का प्रमाण न मानें। जितनी बार बुलाया जाए, उतनी बार सिर झुकाकर आएं। ब्रज में पहुंचना अपने आप में कृपा है। यहां आने वाले भक्त के भीतर यह भाव होना चाहिए कि वह राधारानी के बुलावे पर आया है। कथा के दौरान शिव भक्ति के साथ राधारानी के प्रति समर्पण का भाव भी दिखाई दिया। हर हर महादेव और जय जय श्री राधे के जयकारों से कथा स्थल गूंजता रहा।
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