छाता। योगिराज श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा से सटे छाता की धरती बृहस्पतिवार की देर रात उस आध्यात्मिक आभा में नहा उठी, जहां वैदिक पद्धति की शुद्धता और स्वामी दयानंद की क्रांतिकारी वाणी एक साथ गूंज रही थी। त्रिदिवसीय आर्य महासम्मेलन के समापन क्षण में स्वामी सच्चिदानंद छाता को नई चेतना, नई दृष्टि और नई प्राणशक्ति देकर गए।
आर्य समाज छाता के तत्वावधान में आयोजित त्रिदिवसीय आर्य महासम्मेलन का समापन उस भावपूर्ण वातावरण में हुआ, जब दूर-दराज से आए विद्वान, मनीषी और भजन उपदेशकों ने मंच से स्वामी दयानंद की विश्व को दी गई अमूल्य देन को जन-जन के सामने रखा। रात ढल रही थी, पर सभा की ज्योति, विचारों की तपिश और मन में उठती वैदिक ऊर्जा लगातार बढ़ती जा रही थी।
अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी संत एवं हिंदू सुदी सभा के अध्यक्ष स्वामी सच्चिदानंद ने कहा कि एक बार ठहरकर चिंतन करें कि ऋषि दयानंद और आर्य समाज ने समाज को क्या-क्या नहीं दिया। आज जीवन के जिस किसी क्षेत्र में आप कदम रखें, वहां आर्य समाज का कोई न कोई क्रांतिकारी प्रभाव अवश्य दिखाई देगा। आर्य समाज केवल संगठन नहीं, बल्कि वह आंदोलन है जिसने अंधविश्वास, पाखंड, कुरीतियों, अविद्या और विदेशी सत्ता के विरुद्ध पहली निर्भीक पुकार बुलंद की। उन्होंने कहा कि जब स्वामी दयानंद ने सत्य के प्रकाश को जगाया, तब जो लोग उस प्रकाश के साथ खड़े हुए वे आर्य कहलाए और यहीं से आर्य समाज का विस्तार होता चला गया।
गो रक्षा की पहली प्रभावशाली पहल हो, देश की पहली गोशाला हरियाणा के रेवाड़ी में खोलने का संकल्प हो या फिर मानवता की सेवा के लिए फिरोजपुर में पहला अनाथालय, आर्य समाज ने समाज को वह दिशा दी, जिसकी उस समय अत्यंत आवश्यकता थी। स्त्री शिक्षा के लिए जालंधर में प्रथम विद्यालय खोलकर आर्य समाज ने सामाजिक चेतना की नई नींव रखी।
स्वामी सच्चिदानंद ने कहा कि लगभग साढ़े सात लाख युवाओं को आर्य समाज ने ऐसी राष्ट्रभक्ति और आत्मबल दिया, जिसने देश को स्वतंत्रता की राह पर आगे बढ़ाया। समापन की यह रात छाता में केवल सम्मेलन का अंत नहीं थी, बल्कि एक नई वैदिक चेतना का उदय थी। अंतिम सभा के मुख्य अतिथि दुर्गपाल व विशिष्ट अतिथि अतुल वार्ष्णेय, सतीश जादौन रहे। कार्यक्रम में प्रसिद्ध रागनी गायक नरदेव बेनीवाल धनीराम बेधड़क, संदीप आर्य ने लोगों को महर्षि दयानंद की विश्व को देन विषय पर संबोधित किया। इस दौरान चौ. प्रहलाद आर्य, महिपाल आर्य, विनोद कुमार आर्य, धर्मेद्र आर्य, चंद्रपाल आर्य, प्रवेश, दीपक, भगत सिंह, हरिओम, संदीप आदि सामिल थे।