मुगलकाल में दिल्ली-आगरा जलमार्ग का प्रमुख बंदरगाह वृंदावन था तो यहां स्थापित मदनमोहन मंदिर जहाजोें के लिए दिशासूचक का कार्य करता था। वृंदावन के पौराणिक इतिहास से जुड़ी पांडुलिपियों में यह संदर्भ स्पष्ट है। मंदिर के निर्माण से जुड़ी मान्यताएं भी इस जलमार्ग की समृद्धि को दर्शाती हैं।
बताया जाता है कि वृंदावन में मदनमोहन मंदिर निर्माण से पहले यह स्थान द्वादिशादित्य टीला के रूप में विख्यात था। 16वीं शताब्दी में जब चैतन्य महाप्रभु की परंपरा के गौड़ीय वैष्णव साधक सनातन गोस्वामी को ठाकुर मदनमोहनजी का सेव्य विग्रह प्राप्त हुआ तो उन्होंने यमुना के पावन तट पर उनकी सेवा पूजा की। सनातन गोस्वामी मदनमोहन को अंगा (बाटी का एक प्रकार) का भोग लगाते थे। मान्यता है कि स्वयं मधुकरी करके आराध्य से लाड़ लड़ाने वाले सनातन गोस्वामी का प्रभु से प्रत्यक्ष संबंध था।
एक बार जब ठाकुरजी ने उनसे कहा कि मुझे अंगा में नमक मिलाकर दिया करो तो सनातन गोस्वामी ने भाव वश ठाकुरजी से कह दिया कि अगर अच्छे-अच्छे पकवान चाहिए तो स्वयं ही किसी यजमान की व्यवस्था कर लो। उन दिनों यमुना में जहाज चला करते थे। बताया जाता है कि ठाकुरजी की इच्छानुरूप ही लाहौर (मुल्तान) के नमक व्यापारी रामदास कपूर की नौका यमुना की भंवर में फंस गई। वह प्रार्थना के लिए सनातन गोस्वामी के पास आए। तब सनातन ने कहा जिसने नौका फंसाई है वही निकालेगा तू उन्हीं से प्रार्थना कर। व्यापारी की प्रार्थना पर ठाकुर मदनमोहन की कृपा से समस्या दूर हुई। इसके बाद रामदास कपूर ने उस जमाने में यहां भव्य मंदिर बनवाया।
ब्रज संस्कृति विश्वकोश के सह-संपादक डा. राजेश शर्मा ने बताया जलमार्ग पर चलने वाले व्यापारी हों या तत्कालीन यूरोपियन पर्यटक इनके केंद्र में द्वादिशादित्य टीला या कालान्तर में इस पर बना मदनमोहन मंदिर अवश्य रहा है। वास्तव में मदनमोहन मंदिर जलमार्ग से चलने वाले यात्री और व्यापारियों के लिए वृंदावन की पहचान के रूप में था। रामदास कपूर ने इस मंदिर को बनवाया तो जलमार्ग से यमुना में दिल्ली और आगरा के मध्य यात्रा करने वाले यूरोपियन चित्रकार डेनियल व विलियम डेनियल ने यहां रुक कर पहली बार इस मंदिर का चित्र भी तैयार किया।
पांडुलिपियों में है प्रसंग
गौड़ीय वैष्णव साहित्य के साथ ही गोपालदास ने अपनी पांडुलिपि ‘वृंदावन धामानुरागावली’ में मदनमोहन मंदिर के निर्माण के प्रसंग का उल्लेख किया है। जो इस प्रकार है-
जो भोजन आछे चाहत तौ करहु कोऊ जिजमाना।
रोक्यौ एक जिहाज सेठ तिन किय मंदिर वंधाना।।
रामदास खत्री कपूर लाहौर हि कौ सो जानौ।
टीले के ऊपर राजत सो अबलौं मंद्र पुरानौ।।