खेलत वसंत राधिका दुलहिन दूलहू संग विहारी। चोबा चंदन अतर अरगजा चरचत प्रीतम प्यारी।। गाई बजाई सखी हो-हो कहि चोंप बढावत भारी। गोपीलाल हितरूप प्रेम छकि निर्तत चतुर खिलारी।।
मंगलवार को ठाकुर राधावल्लभ मंदिर में शुरू हुए समाज गायन में यह पद सुनकर भक्त भाव विभोर हो गए।
समाजी राकेश मुखिया और रवि पाठक ने एक के बाद एक पद गाए। यह रितु आई री वसंत फूल्यौ पिय प्यारी मन भाई। अली मदन फूलीं चहूं ओरन गावत अतिहि सुहाई।।
खेलत हैं वसंत रस छाके राधा निर्त विहारी। हो-हो-हो-हो-हो थेइ-थेइ कहि कहि निर्तत दै कर तारी।। आदि पदों का गान किया गया।
सेवायत मोहित मराल गोस्वामी ने बताया कि राधावल्लभ मंदिर में समाज गायन की प्राचीन परंपरा है। नगर के विभन्न देवालयों में समाज गायन की यह परंपरा आज भी जीवंत है। इस पद्धति का प्रचार गोस्वामी हित हरिवंश, श्रीहरिराम व्यास और स्वामी श्रीहरिदास जी की उपासना स्वरूप दृष्टिगोचर होता है।
समाजी राकेश मुखिया ने बताया कि हम उत्सवों के अनुरूप फूल रचना, चंदन के पद, वन विहार, खिचड़ी, नौका जल विहार, वसंत, रथयात्रा, होली, दिवाली आदि के पदों का गायन विभिन्न राग और तालों से करते हैं। डा. राजेश शर्मा ने बताया कि हरित्रयी या रसिकत्रयी की यह उपासना पद्धति ब्रज संस्कृति की बहुमूल्य निधि है।
भूमिका होती है, इसके द्वारा लय और ताल का संतुलन बना रहता है। झांझ बजाने वाला प्राय: पखावजी के पास ही बैठता है। समाज गायन में प्रमुख गायक को मुखिया और उसके सहयोगी को झेला कहा जाता है। समाज गायन के समय मुखिया एक विशेष धुन में पद का गायन आरंभ करता है और झेला उसका सहयोग करते हुए पखावजी और सारंगी वादकों से ताल बैठाते हुए समाज गान में अपनी सहभागिता देता है।